लॉकडाउन में पूरी सैलरी का मामला / सुप्रीम कोर्ट ने कहा- कंपनियों पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, इंडस्ट्री और वर्कर्स को एक-दूसरे की जरूरत होती है, वे आपस में विवाद सुलझाएं

नई दिल्ली. अगर लॉकडाउन के दौरान प्राइवेट कंपनियां अपने वर्कर्स को पूरी सैलरी देने में नाकाम रही हैं, तो उन पर अभी सख्त कार्रवाई नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने आपस में विवाद सुलझाने पर जोर दिया है। इस मामले में अगली सुनवाई जुलाई के आखिरी हफ्ते में होगी। सुनवाई की तारीख तय नहीं है।

सवाल-जवाब में समझें पूरा मामला…

गृह मंत्रालय के किस ऑर्डर पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई?
गृह मंत्रालय ने 29 मार्च को एक ऑर्डर जारी किया था। इसमें कहा गया था कि जब देशभर में लॉकडाउन चल रहा है, तब सभी इम्प्लॉयर्स अपने वर्कर्स को तय तारीख पर सैलरी दें और इसमें कोई कटौती न करें। गृह मंत्रालय का यह ऑर्डर लॉकडाउन के 54 दिनों के लिए था।

मामला सुप्रीम कोर्ट में कैसे पहुंचा?
हैंड टूल्स मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन और जूट मिल्स एसोसिएशन समेत कुछ प्राइवेट कंपनियों ने गृह मंत्रालय के ऑर्डर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन लगाई थी। इस पर 15 मई को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई कर इंटरिम ऑर्डर जारी किया था। इसमें कहा गया था कि गृह मंत्रालय का ऑर्डर नहीं मानने वाली कंपनियों पर कार्रवाई न हो।

सुप्रीम कोर्ट में आज क्या हुआ? क्या कंपनियों पर पूरी तरह रोक रहेगी?
जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस संजय कृष्ण कौल और जस्टिस एमआर शाह की बेंच ने शुक्रवार को सुनवाई की। बेंच ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान पूरी सैलरी देने में नाकाम रही कंपनियों पर सख्त कार्रवाई न की जाए। कंपनियों को जुलाई के आखिरी हफ्ते तक के लिए यह राहत मिली है।

सरकार के लिए सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा है?

अगर कंपनियों और वर्कर्स के बीच विवाद न सुलझे तो लेबर डिपार्टमेंट को सैटलमेंट में मदद करनी होगी।
राज्य सरकारों को भी सैटलमेंट में मदद करनी होगी और इसकी रिपोर्ट लेबर कमिश्नर को सौंपनी होगी।
केंद्र और राज्य सरकारें इस मुद्दे पर टुकड़ों-टुकड़ों में ध्यान न दें। उन्हें सैटलमेंट के बारे में लेबर डिपार्टमेंट के जरिए सर्कुलर निकालना चाहिए।
केंद्र सरकार 4 हफ्ते में एफिडेविट पेश कर गृह मंत्रालय के 29 मार्च के ऑर्डर पर अपना जवाब दाखिल करे।
पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
सुप्रीम कोर्ट ने 4 जून को फैसला रिजर्व रख लिया था। कोर्ट ने कहा था कि वर्कर्स को बिना सैलरी दिए नहीं छोड़ना चाहिए। कंपनियों के पास पैसे नहीं हैं तो सरकार दखल दे सकती है। सैलरी का 50% पेमेंट भी किया जा सकता है। हालांकि, सरकार का कहना था कि जो कंपनियां सैलरी देने में दिक्कत होने की बात कर रही हैं, उन्हें अपनी ऑडिटेड बैलेंस शीट कोर्ट में पेश करने को कहा जाना चाहिए।

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