राम मंदिर शिलान्यास पर तकरार:शंकराचार्य स्वरूपानंद बोले- 5 अगस्त का समय बहुत अशुभ, अयोध्या के महंत कमल नयन दास ने कहा- शिलान्यास तो हो चुका, अब निर्माण का शुभारंभ होगा

राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण की शुरुआत 5 अगस्त को होनी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नींव में ईंट रखकर मंदिर निर्माण का शुभारंभ करेंगे। लेकिन, ईंट रखने का जो मुहूर्त चुना गया है, उस पर धर्माचार्यों में तकरार शुरू हो गई है। जगद्गुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने कहा कि भूमि पूजन का समय अशुभ है। भाद्रपद में किया गया कोई भी शुभारंभ विनाशकारी होता है।

हालांकि, राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास के उत्ताराधिकारी महंत कमल नयन दास ने इस आशंका को खारिज कर दिया है। महंत कमल नयन ने कहा कि मंदिर का शिलान्यास तो 1989 में कामेश्वर चौपाल ने कर दिया है। अब प्रधानमंत्री को केवल आधारशिला रखकर निर्माण का शुभारंभ करना है। संत भी यही चाहते हैं।

मंदिर जनता के पैसे से बन रहा, जनता से राय लें- शंकराचार्य

शंकराचार्य ने कहा- हम राम भक्त हैं। मंदिर कोई भी बनाए, हमें खुशी होगी। मंदिर निर्माण के लिए शुभ तिथि और शुभ मुहूर्त होना चाहिए। अगर मंदिर जनता के पैसे से बनना है तो जनता से राय लेनी चाहिए। मंदिर निर्माण के लिए शताब्दियों से आंदोलन चला आ रहा है। मैं खुद कई बार जेल गया। शिलान्यास के लिए अशुभ समय क्यों चुना गया, यह समझ से परे है।

हालांकि, इस पर अयोध्या के संत समाज ने स्वरूपानंद को चुनौती दे डाली है कि वे शास्त्रार्थ ज्ञान 5 अगस्त को आकर सिद्ध करें।

राम मंदिर अंकोरवाट मंदिर की तर्ज पर बने

स्वरूपानंद सरस्वती ने कहा कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण कंबोडिया के अंकोरवाट मंदिर की तर्ज पर होना चाहिए। उन्होंने कहा कि पहले चालुक्य नरेशों का राज वहां था। 11वीं शताब्दी में इन नरेशों ने वहां एक भव्य मंदिर बनवाया था। मंदिर एक बार बनना है, इसलिए इसकी विशालता और भव्यता का ध्यान रखाना जरूरी है। राजीव गांधी और अशोक सिंघल के रिश्ते ने अयोध्या में राम मंदिर की जमीन की राह तैयार की। मंदिर का निर्माण का जिम्मा योग्य व्यक्तियों के हाथों में होना चाहिए।

अंकोरवाट: सबसे बड़ा धार्मिक स्थल
अंकोरवाट कंबोडिया में बना मंदिर करीब 162.6 हेक्टेयर में फैला है। इसे मूल रूप से खमेर साम्राज्य में भगवान विष्णु के एक हिंदू मंदिर के रूप में बनाया गया था। मी कांग नदी के किनारे सिमरिप शहर में बना यह मंदिर आज भी संसार का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर है। यह मंदिर मेरु पर्वत का भी प्रतीक है। इसकी दीवारों पर भारतीय धर्म ग्रंथों के प्रसंगों का चित्रण है।

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