मुरादनगर से ग्राउंड रिपोर्ट:एक गली में आठ लाशें, कहीं बच्चे बिलख रहे हैं तो कहीं मां-बाप; परिजन बोले- हमें दो लाख नहीं, परिवार चाहिए

गाजियाबाद. मुरादनगर में भ्रष्टाचार के दानवों के सामने लगता है भगवान भी बेबस हो गए। ‘एक मौत उस घर में हुई है, एक उसमें, वहां उस घर में भी दो लोग मरे हैं, हमारी इस गली में ही आठ लोगों की मौत हुई है।’ मुरादनगर की डिफेंस कॉलोनी में एक घर के बाहर बैठी ये महिला उंगलियों पर गिनकर श्मशान स्थल पर हुए हादसे में मारे गए लोगों के बारे में बता रही है।

गाजियाबाद प्रशासन ने हादसे में अभी तक 25 लोगों के मारे जाने की पुष्टि की है। बीस से ज्यादा लोग घायल हैं। इस गली में घरों के बाहर लोग खामोश बैठे हैं। कुछ घरों में शव रखे हैं, जबकि कुछ शवों को गाजियाबाद-मेरठ रोड पर रखकर जाम लगा दिया गया।
67 साल के ओमप्रकाश का शव घर में अकेले रखा गया है। महिलाएं रोते-रोते खामोश हो गई हैं। बाहर बैठे लोग ये कहकर दिलासा दे रहे हैं कि ये तो रिटायर हो गए थे, जिम्मेदारियां पूरी कर दी थीं लेकिन उनके परिवारों का क्या जो अकेले कमाने वाले थे? 11 साल की अनुष्का ने हादसे से कुछ देर पहले ही अपने पिता से फोन करके जल्दी घर आने के लिए कहा था। लेकिन अब उनकी लाश घर के बरामदे में रखी हैं।

अनुष्का की आंखें पथरा गई है, वो सामने पैदा हुए हालात को समझ नहीं पा रही है। मां पहले से ही मानसिक रूप से कमजोर हैं जिसकी बीमारी की वजह से दो साल पहले बड़ी बहन ने आत्महत्या कर ली थी। अब मौसी ने उसका हाथ थामा हुआ है। अनुष्का नहीं जानती आगे जिंदगी में क्या होगा। उसके पिता सतीश कुमार राजस्व विभाग में पेशकार थे।

यहां से कुछ ही दूर ओमकार का घर है। 48 साल के ओमकार सब्जी बेचते थे। उनके छोटे भाई अंतिम संस्कार की तैयारियां कर रहे थे। शैया तैयार करते हुए वो कहते हैं, ‘मेरे भाई के दो छोटे-छोटे बच्चे हैं, उनका पेट अब कैसे पलेगा?’ चार बच्चों के पिता नीरज का घर भी यहीं हैं। उनकी मौत के बाद अब परिजन सवाल करते हैं, ‘घर बनाने के लिए लिया गया कर्ज कौन उतारेगा। बच्चों का पेट कौन भरेगा। दो लाख का मुआवजा क्या इस परिवार के लिए काफी होगा?’
पत्रकार मुकेश सोनी अपने घर के बाहर खामोश बैठे हैं। वो अपने 22 वर्षीय बेटे दिग्विजय कि चिता को आग लगाकर आए हैं। उनसे मिलने आए कुछ पत्रकार दिलासा देते हुए व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार की दुहाई दे रहे हैं। बेटे का नाम आते ही मुकेश फफक पड़ते हैं। शब्द उनके गले में फंस जाते हैं। उनकी बेबस आंखें बोलती हैं। मानो कह रही हों, जो पत्रकार जीवन भर भ्रष्टाचार पर लिखता रहा, उसका अपना बेटा ही भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया और वो कुछ नहीं कर पाया।

दिग्विजय की नानी का घर सटा हुआ है। उसे बचपन से नानी ने ही पाला था। अपने घर के सबसे बड़े बच्चे की मौत से नानी बदहवास हैं। वो बार-बार रोते हुए कहती हैं, ‘मुझे दो लाख नहीं चाहिए, अपना बच्चा चाहिए। मुझसे तीन लाख ले जाओ, मेरे बेटा ला दो।’

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