भोपाल से लेफ्टिनेंट बने अनुज की कहानी / पहले दो कैडेट्स के बीच 0.5 मीटर की दूरी होती थी, इस बार 2 मीटर रखी गई, हाथ में ग्लव्ज और चेहरे पर मास्क भी लगाया

भोपाल के अनुज लेफ्टिनेंट बने, पहली पोस्टिंग पर दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध के मैदान सियाचिन जाएंगे
एक साल पहले अनुज के भाई आदित्य दुबे ने सेना ज्वॉइन की थी, पहली बार पासिंग आउट परेड में शामिल नहीं हो पाएंगे पेरेंट्स
भोपाल. ‘कोरोनावायरस की वजह से हम सब सोच रहे थे कि पासिंग आउट परेड होगी या नहीं, लेकिन बाद में सेना ने तय किया कि सावधानी बरतते हुए पासिंग आउट परेड कराई जाए। परेड की लाइव स्ट्रीमिंग डीडी नेशनल और यूट्यूब चैनल पर की गई। इस दौरान अतिरिक्त सावधानी बरती गई।’ यह कहना है भोपाल के अनुज दुबे का, जो भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए) में एक साल की कड़ी ट्रेनिंग के बाद भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट बन गए। अनुज ने 13 जून यानी शनिवार को आईएमए की पासिंग आउट परेड में हिस्सा लिया।

उन्होंने फोन पर बताया, ‘परेड के लिए पहले 10 ग्रुप बनाए जाते थे और दो कैडेट्स के बीच 0.5 मीटर की दूरी होती थी, लेकिन इस बार दो कैडेट्स के बीच में 2 मीटर की रखी गई। हर कैडेट ने चेहरे पर मास्क और हाथों में ग्लव्स पहना। ग्रुप पर भी घटाकर 8 किए गए।’ आईएमए के 87 साल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ, जब कैडेट की इस परेड में उनके माता-पिता शामिल नहीं हुए।

अनुज ने कहा- इस बात की खुशी है कि मां मुझे टीवी पर देख पाएंगी

भास्कर से बातचीत में अनुज ने कहा, ‘मुझे चार साल से जिस क्षण का बेसब्री से इंतजार था कि मां आएंगी और सेना की वर्दी में मेरे दोनों कंधों पर दो-दो सितारे जड़ देंगी। अब ये सपना पूरा नहीं हो पाया, लेकिन इस बात की खुशी है कि मां पासिंग आउट परेड में मुझे परिवार के साथ टीवी पर लाइव पाईं।’
सियाचिन में तैनाती मिलना सपने के पूरे होने जैसा
अनुज को सीधे सियाचिन में तैनाती दी जा रही है। उन्होंने बताया, ‘सियाचिन में पहली पोस्टिंग उनके लिए सपने के पूरा होने जैसा है। बचपन से सुनता आ रहा था कि सियाचिन में सेना तैनात की जाती है। मैं भी गूगल करके सिचाचिन के बारे में जानकारी लेता था। अब उसी ड्रीम प्लेस में मुझे पोस्टिंग मिल रही है। इसे लेकर बहुत एक्साइटेड हूं।’

दुनिया के सबसे ऊंचे क्षेत्र और माइनस में टेम्परेचर वाली जगह पर कैसे तालमेल बिठाएंगे? इस सवाल के जवाब में अनुज कहते हैं, ‘ट्रेनिंग के दौरान हमें शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार किया जाता है, फिर वहां जाने के बाद हफ्तेभर उस वातावरण में ढाला जाता है। मुझे उम्मीद है कि मैं बहुत जल्दी उस वातावरण में ढल जाऊंगा और फिर ऊंचाई पर बर्फ में ड्यूटी भी लगाई जाएगी।’

मां ने तैयार कर लिया था गुजिया और खुरमे
अनुज की मां अंजू दुबे इस बात से निराश हैं कि वह बेटे की पासिंग आउट परेड में शामिल नहीं हो पाईं, लेकिन टीवी पर देखने की खुशी भी है।वह जनवरी में घर आया था, इसके बाद हम मार्च में होली पर उससे मिलने जाने वाले थे, लेकिन कोरोना वायरस के कारण नहीं जा पाए और फिर लॉकडाउन हो गया। हमने सोचा था लॉकडाउन खुलेगा और पासआउट परेड में जा सकेंगे। अनुज खाने-पीने और कपड़ों का शौकीन है। इसलिए मैंने उसकी फेवरेट गुजिया और खुरमे बना लिए थे। पहले मैं समझाती थी, वो सुनता था। अब मैं चिंता करती हूं तो कहता है फिक्र मत करो, मैं हूं न।
कोरोनावायरस ने बदला तौर-तरीका
आम तौर पर सेना में पासिंग आउट परेड के बाद अफसरों को 15-20 दिन की छुट्टी दी जाती है, जिससे वह अपने परिवार से मिल सकें। इसके बाद ड्यूटी पर भेजा जाता था, लेकिन कोरोना वायरस के चलते इस बार आईएमए से पास आउट हो रहे करीब 400 कैडेट को अफसर बनने के 24 घंटे के अंदर तैनाती दी जा रही है।

अनुज ने बताया कि कुछ राज्यों में लॉकडाउन खुल गया है, लेकिन कुछ जगह अब भी लॉकडाउन है। कुछ अफसरों को छुट्टी दी जाती और कुछ को नहीं। ये ठीक नहीं होता, इसलिए सभी को एक साथ पोस्टिंग दी जा रही है। सेना का मानना है कि हम यहां पर सुरक्षित माहौल में हैं और पोस्टिंग के बाद भी सुरक्षित रहेंगे। छुट्टी के बाद ट्रैवल करना सेफ नहीं है।

कोविड ने सेना की ट्रेनिंग का तरीका बदला
अनुज ने बताया, ‘लॉकडाउन की घोषणा होने के बाद से ही आईएमए में ट्रेनिंग का तरीका बदल गया। मार्च से हमें कमरे से बाहर निकलने पर हर वक्त मास्क लगाना और सैनिटाइजर साथ में रखना अनिवार्य कर दिया गया। इसके बाद हम मैदान में फिजिकल ट्रेनिंग के लिए आते तो किसी भी चीज को टच करने पर पाबंदी लगा दी गई।

हमें केवल खुद से दौड़ना, पुशअप्स और अन्य एक्सरसाइज कराई जाने लगी। इसमें भी दूरी बनाकर रखनी होती थी। हालांकि, इस दौरान कोऑर्डिनेशन में परेशानी आई। इसके साथ ही ग्रुप में कमरों में होने वाली पढ़ाई को भी बंद कर दिया गया। 60-70 की जगह 20-30 कैडेट्स के ग्रुप बनाए गए और बाकी पढ़ाई अपनी बिल्डिंग में ही करनी पड़ी।’

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