भगवान… मेरी बेटी कभी मां बनने लायक ना हो

12 साल से सोई नहीं, आंख लगते ही डर जाती हूं; कहीं अनहोनी न हो जाए

मैं भगवान से दुआ करती हूं कि मेरी बेटी को पीरियड्स नहीं आए, उसकी शादी नहीं हो, वह मां बनने लायक नहीं हो। दुनिया की कोई मां ऐसा नहीं चाहेगी। मैं भी नहीं चाहती, लेकिन मजबूर हूं। 12 साल से मेरे लिए दिन-रात एक है। जरा सी आंख लगती है तो चौंककर उठ जाती हूं, सहम जाती हूं कि कहीं कुछ अनहोनी न हो जाए।

कई बार विचलित हो जाती हूं। थक जाती हूं। लगता है जीने का कोई मतलब नहीं। फिर सोचती हूं एक मां को थकने का अधिकार नहीं। उसे हर हाल में जीना ही होगा।

मैं साधना राधा रमण मिश्र, दिल्ली की रहने वाली हूं। दो बेटियों की मां हूं। पति प्राइवेट जॉब करते हैं। बड़ी बेटी 26 साल की है और छोटी बेटी 14 साल की। मेरी पूरी कहानी छोटी बेटी के इर्द-गिर्द ही है। वो जब से पैदा हुई है, चौबीसों घंटे बस उसी के ख्यालों में डूबी रहती हूं।

2008 की बात है। दूसरी बार मां बनने वाली थी। सब खुश थे। 12 साल बाद मां बनने वाली थी। बड़ी बेटी भी बहुत खुश थी कि उसका नन्हा सा भाई या बहन आने वाली है। एक-एक दिन करके मैं डिलीवरी का दिन गिनती थी।

आखिरकार 29 अप्रैल 2008 को मैं फिर से मां बनी। एक प्यारी सी बेटी दुनिया में आई। नाम रखा युक्ति। सोचा अब दो बेटियों की मां बन गई। सबकुछ मिल गया। बड़ी बेटी भी दिनभर अपनी छोटी बहन को गोद में लिए इधर से उधर मटकती रहती थी।

इसी तरह हंसी-खुशी वक्त बीतता रहा। युक्ति सात महीने की हो गई। उसके दांत निकालने शुरू हो गए। 9वें महीने में वह खुद से चलने लगी, लेकिन बोलती बहुत कम थी। कभी-कभी मन ही मन कुछ बुदबुदाते रहती। हमने युक्ति के सभी वैक्सीनेशन करवाए। मिडिल क्लास फैमिली से होने के बाद भी कभी कोई कोताही नहीं बरती।

जब युक्ति ढाई साल की हुई तो मैंने उसे अपना दूध पिलाना बंद कर दिया। इसके बाद वो ग्लास से दूध पीने लगी। फ्रूट, रोटी, खिचड़ी सब खाती। उसकी सारी एक्टिविटी नॉर्मल बच्चों सी थी, लेकिन अभी तक उसने बोलना शुरू नहीं किया था। जबकि इस उम्र तक बड़ी बेटी खूब बोलती थी।

मुझे लगा कि कई बच्चे देर से बोलते हैं, युक्ति भी कुछ वक्त बाद बोलने लगेगी, पर ऐसा हुआ नहीं। तीन साल के बाद भी युक्ति बोल नहीं पा रही थी। अब मुझे लगने लगा कि कुछ तो गड़बड़ है, लेकिन क्या गड़बड़ है पता नहीं चल रहा था।

इसके बाद मैं उसे डॉक्टर के पास लेकर गई। डॉक्टर ने कहा कि घबराने की कोई बात नहीं है। कुछ बच्चे देर से बोलते हैं। दो-तीन महीने बाद दूसरे डॉक्टर के पास लेकर गई। उस डॉक्टर ने भी कहा कि कोई दिक्कत नहीं है।

एक-एक करके कई डॉक्टरों को दिखाया, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ। इस तरह युक्ति 5 साल की हो गई। वो बस दो ही शब्द बोलती थी- ए जोत्ती…ए लाली…

मैं सोचती थी कि घर में कोई इस नाम का है नहीं, ना ही कोई आसपास इस नाम का रहता है। फिर सोचने लगी कि शायद पिछले जन्म की याद होगी, धीरे-धीरे भूल जाएगी।

इसके बाद युक्ति की पहले स्पीच थेरेपी और फिर साउंड थेरेपी शुरू हुई, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। उसकी उम्र बढ़ रही थी, खाना-पीना भी ठीक से कर रही थी, लेकिन बोल नहीं पा रही थी।

इसी बीच एक स्कूल में उसका एडमिशन कराया। कुछ दिन बाद ही टीचर कहने लगे कि इसका नाम कटवा लो। ये इधर-उधर दौड़ती रहती है। कभी खिड़की पर चढ़ जाती है, तो कभी चीखने लगती है। पूरी क्लास को डिस्टर्ब करती है। उसकी पढ़ाई भी छूट गई।

पति की छोटी सी प्राइवेट नौकरी। तीन-तीन खाने वाले और 2500 रुपए न्यूरो डॉक्टर की फीस। इसके अलावा मेडिकल टेस्ट, दवाएं, आना-जाना सब मिलाकर बहुत भारी पड़ने लगा, लेकिन हम मजबूर थे। मर के भी पीछे नहीं हट सकते थे।

एक बार की बात है। मैं काम करते-करते थक गई। बेड पर ऐसे ही लेटी थी कि अचानक से नींद आ गई। तभी देखा कि युक्ति किचन में चाकू लेकर इधर-उधर कर रही है। मेरी तो जान ही निकल गई।

मैं खुद को कोसने लगी कि क्यों सो गई। समझ नहीं आ रहा था क्या करूं। अगर जबरदस्ती चाकू लिया तो वो अपने को मार लेगी, छीना-झपटी में उसे ही नुकसान हो जाएगा।

मैंने उसे कुछ सुंदर चीज दिखाई और बोलने लगी कि देखो युक्ति…यह कितना सुंदर है, देखो…ऐसे करते-करते उसके पास गई और उसका हाथ पकड़ लिया। फिर उसके हाथ से चाकू लिया।

एक बार पति ने शेव करके रेजर वहीं छोड़ दिया। वह युक्ति के हाथ आ गया। वह उसे उठाकर देखने लगी। उसके पूरे होंठ कट गए, लेकिन खून देखकर भी उसे कुछ नहीं हुआ। वह रेजर से खेलती रही। मैं भागी-भागी गई। उसके हाथ से रेजर लिया, उसके हाथ धुलवाए। फिर उस पर बर्फ लगाया।

ऐसे अनगिनत किस्से हैं। हर वक्त का किस्सा है। आज भी वो पॉटी करती है और मेरा ध्यान इधर-उधर हो जाए तो अपने हाथ में लगा लेती है। शरीर में लगा लेती है।

यही वजह है कि मैं कभी ठीक से सोती नहीं। सोती भी हूं तो थोड़ी देर में ही आंख खुल जाती है। हर पल युक्ति की ही चिंता रहती है। कहीं जा भी नहीं सकती।

आखिरकार उसका एमआरआई हुआ, पता चला कि उसके ब्रेन में सिस्ट है। सिस्ट यानी उसके ब्रेन में लिक्विड जमा हो गया है। यह सुनकर मेरे तो होश ही उड़ गए। इसके बाद तो अस्पतालों की भाग-दौड़ और ज्यादा बढ़ गई।

मैं डॉक्टरों से पूछती थी कि मेरी बच्ची बोल क्यों नहीं पा रही? मेरी बेटी कभी ठीक होगी कि नहीं? कोई डॉक्टर ठीक-ठीक जवाब नहीं दे पा रहा था। मैंने गूगल करना शुरू किया। बेटी के लक्षण गूगल पर सर्च करती थी कि आखिर यह कौन सी बीमारी है? क्यों ऐसा हो रहा है?

फिर मुझे पता चला कि यह ऑटिज्म है और मेरी बेटी ऑटिस्टिक है। ऐसे बच्चे पैदा होने के बाद से ही दिमाग से कमजोर होते हैं। शरीर तो उनका डेवलप होता है, लेकिन दिमाग वैसा ही रह जाता है। यही वजह है कि उन्हें पता ही नहीं चलता वे क्या कर रहे हैं, क्यों कर रहे हैं।

मैंने इसे ठीक करने की पूरी कोशिश की। कोई ऐसा डॉक्टर नहीं होगा जहां नहीं गई। जहां भी लोग बताते पैसों की तंगी के बाद भी जाती। आज भी हिम्मत नहीं हारी हूं, लेकिन लाचार हूं। किस्मत पर मेरा वश नहीं है। सारी रात रोती हूं कि मैंने कभी किसी का बुरा नहीं किया, फिर मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ।

कई बार तो युक्ति आधी रात को उठकर दौड़ने-भागने लगती है। डॉक्टर का कहना है कि यह हाइपर एक्टिव है। सड़कों पर, पार्क में हर जगह दौड़ना चाहती है। उसके पीछे-पीछे हम भी भागते रहते हैं।

नाते-रिश्ते, मंदिर हर जगह जाना बंद हो गया है। किसी की शादी में भी जाना हो तो सौ बार सोचती हूं। युक्ति को अकेले घर पर छोड़ नहीं सकती और साथ लेकर जाऊं तो उसे संभालना मुश्किल हो जाता है। ऊपर से लोग उसे देखकर कमेंट करने लगते हैं। तब तकलीफ और ज्यादा होने लगती है।

पति को अपने काम से ही फुर्सत नहीं मिलती। बड़ी बेटी का कॉलेज रहता है। सबका खाना बनाना, दोनों का टिफिन बनाना और साथ में युक्ति की देखरेख करना। सबकुछ अकेले मुझे ही मैनेज करना होता है।
मैं अपने सारे काम संडे को करती हूं जब पति की छुट्टी होती है। उस दिन वे थोड़ा साथ देते हैं। बाकी मेरा जीवन तो ऐसा है कि अपने लिए सुबह दो पराठे बना भी लिए तो दिनभर खाने का समय नहीं मिलता है।

हम ऑटिस्टिक बच्चों को साइकेट्रिस्ट के पास ले जाते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि बच्चों के साथ उनके माता-पिता को भी साइकेट्रिस्ट की जरूरत होती है।

पति मुझे हमेशा बोलते हैं कि तुमने युक्ति को तमीज नहीं सिखाई, बहुत सिर चढ़ा रखा है। उन्होंने आज तक स्वीकार ही नहीं किया कि उनकी बेटी ऑटिस्टिक है, वह दिमागी तौर पर मंदबुद्धि है, उसकी समझ ही विकसित नहीं हुई है। आखिर मैं क्या कर सकती हूं।

युक्ति अब 14 साल की हो गई है। उसके शरीर में परिवर्तन होने शुरू हो गए हैं। कभी भी पीरियड्स शुरू हो सकते हैं, लेकिन मैं पल-पल भगवान के आगे दुआ करती हूं कि मेरी बेटी को पीरियड्स नहीं आएं। वह कैसे संभालेगी खुद को।

बाहर की दुनिया बहुत खतरनाक है। किसी पर भरोसा नहीं कर सकते। नॉर्मल बच्चों के साथ लोग गंदी हरकतें कर देते हैं। मेरी बच्ची तो सीधी है। डर लगता है कि कहीं उसके साथ कुछ गलत न हो जाए या वो खुद कोई गलत कदम न उठा ले। फिर मैं कहां जाऊंगी, क्या करूंगी।

काश मैं इन बच्चों के लिए अलग दुनिया बसा पाती। एक ऐसी दुनिया जहां इस तरह के बच्चे बिना डरें रह सकें, उन्हें कोई नुकसान ना पहुंचा पाए।

कभी-कभी तो लगता है कि मैं जी क्यों रही हूं, मर क्यों नहीं जाती, लेकिन कौन मां अपने बच्चों को छोड़कर मरना चाहेगी। वो भी इस हाल में।

इसलिए मन बहलाने के लिए कभी-कभी यूट्यूब पर गाने सुनती हूं। भजन सुनती हूं। बड़ी बेटी कोशिश करती है कि मैं ज्यादा परेशान नहीं रहूं, क्योंकि अगर मैं डिप्रेशन में चली गई तो मेरा पूरा परिवार टूट जाएगा, बिखर जाएगा।

साधना राधा रमण मिश्र ने ये सारी बातें भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से शेयर की है…

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मेरा कोई अपना नहीं है। सगे पापा ने मुझे और मां को घर से निकाल दिया क्योंकि मैं बेटी पैदा हुई। तब मैंने पहला बर्थडे भी नहीं मनाया था। मां ने दूसरी शादी की। उसके पति को मैंने पापा माना, लेकिन उनके पिता ने मेरा रेप कर दिया। तब मैं महज 12 साल की थी। मां ने तो तीसरी शादी कर ली, लेकिन मैं उसके पति को पापा नहीं मान सकी। अभी 12वीं में हूं। 6 साल से रेप विक्टिम सेंटर ही मेरा घर है।

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