बिना ठाकरे की शिवसेना:ऑपरेशन लोटस का टारगेट उद्धव की कुर्सी ही नहीं

शिवसेना भी छीनना है; 3 पॉइंट्स से समझें

एकनाथ शिंदे को दलबदल कानून से बचते हुए उद्धव सरकार गिराने के लिए शिवसेना के 37 विधायक चाहिए, फिर भी वो रुक नहीं रहे। वो बागियों के डेरे में लगातार शिवसेना विधायकों को जोड़ते जा रहे हैं। गुवाहटी के पांच सितारा होटल के बाहर शिंदे ने 46 विधायक साथ होने का दावा किया। दैनिक भास्कर के सूत्र बता रहे हैं कि बागियों की तादात 50 तक पहुंच सकती है।

बस यहीं एक सवाल कौंध रहा है। आखिर शिंदे चाहते क्या हैं? वो लगातार जरूरत से ज्यादा शिवसेना के बागी विधायकों को क्यों जुटा रहे हैं? उधर, BJP ने अब तक विधानसभा सत्र बुलाने की मांग क्यों नहीं की है? उद्धव से खुली बगावत के बावजूद शिंदे लगातर क्यों कह रहे हैं कि वो बाला साहेब के सच्चे शिवसैनिक हैं और उन्होंने शिवसेना नहीं छोड़ी है।

इन सभी सवालों का एक ही जवाब है- एकनाथ शिंदे का मिशन सिर्फ उद्धव ठाकरे की कुर्सी छीनना नहीं, बल्कि शिवसेना भी छीनना है।

लेकिन कैसे…?

आगे बढ़ने से पहले हमें यह समझना होगा कि कानूनी तौर पर राजनीतिक पार्टियों में बंटवारा दो हालात में होता है।

पहला- जब संसद या विधानसभा सत्र में हों, यानी उनकी बैठक चल रही हों।

दूसरा- जब संसद या विधानसभा सत्र में न हों।

पहली परिस्थिति, में यानी जब संसद या विधानसभा सत्र में होती हैं तो किसी भी पार्टी के विधायकों के बीच होने वाले बंटवारे को पार्टी में बंटवारा माना जाता है। ऐसे बंटवारे पर ही दल-बदल कानून लागू होता है।

सीधे-सीधे कहें तो दल बदल कानून लागू करने के लिए संसद या विधानसभा को सत्र में होना जरूरी है। ऐसे हालात में गेंद विधानसभा के स्पीकर के हाथों में चली जाती है।

दूसरी तरह के हालात में, यानी जब संसद या विधानसभा सत्र में नहीं होती तब किसी भी पार्टी में होने वाला बंटवारा संसद या विधानसभा से बाहर का बंटवारा माना जाता है।

ऐसे में अगर पार्टी के चुनाव चिह्न पर कोई खेमा दावा करता है, यानी जब यह तय होना होता है कि कौन सा खेमा असली पार्टी है तब इन पर सिंबल्स ऑर्डर 1968 लागू होता है। सिंबल्स ऑर्डर 1968 के तहत सिर्फ चुनाव आयोग फैसला करता है।

सीधे शब्दों में कहें तो संसद या विधानसभा के सत्र में होने पर पार्टियों में होने वाले बंटवारे की गेंद चुनाव आयोग के पास चली जाती है।

विधानसभा से बाहर राजनीतिक पार्टियों में बंटवारे के सवाल को चुनाव आयोग सिंबल्स ऑर्डर 1968 के तहत तय करता है। इसके लिए आयोग सभी पक्षों को सुनकर फैसला करता है। आयोग सिंबल को फ्रीज भी कर सकता है। यानी कोई भी खेमा पार्टी सिंबल का इस्तेमाल नहीं कर पाता है।

पिछले 24 घंटे की बयानबाजी में असली शिवसेना और उद्धव की शिवसेना का फर्क बता रहे हैं एकनाथ शिंदे…

अब तीन बातों से जो तस्वीर दिख रही है, उसमें साफ है कि शिंदे का निशाना सिर्फ उद्धव की कुर्सी नहीं, शिवसेना हथियाना है…

  • शिंदे लगातार बागी विधायकों की संख्या बढ़ाकर शिवसेना पर दावा ठोक सकते हैं।
  • गेंद चुनाव आयोग के पाले में रहे इसलिए BJP विधानसभा सत्र बुलाने की मांग नहीं कर रही है।
  • असली शिवसैनिक जैसे बयान देकर शिंदे दिखाना चाहते हैं कि उन्हें पार्टी से बगावत नहीं की और असली शिवसेना वही हैं।

 

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