बात बराबरी की:जो चीज अनमैरिड के लिए जबर्दस्ती कहलाती है

वही चीज शादीशुदा स्त्री के मामले में छूट पा जाती है, यही तो मैरिटल रेप है

‘एक संस्था के तौर पर शादी किसी भी तरह का मेल प्रिविलेज न तो देती है, न दे सकती है। न ही इसे किसी महिला पर एक खतरनाक जानवर छोड़ देने का लाइसेंस माना जाए। अगर रेप के लिए किसी पुरुष को सजा दी जाती है, तो रेप के दोषी हर पुरुष को सजा मिलनी चाहिए, फिर चाहे वो पति ही क्यों न हो।’

इसी मार्च में ये कहते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने मैरिटल रेप के आरोपी पर कार्रवाई की बात की, लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी है।

मामला बेंगलुरु का है। हृषिकेश साहू नाम के शख्स पर उनकी पत्नी ने रेप का आरोप लगाया। पत्नी के मुताबिक, पति उसे सेक्स स्लेव की तरह इस्तेमाल करता और इनकार पर बच्ची के सामने ही जबर्दस्ती करने लगता है।

बच्ची की सेफ्टी को लेकर डरी हुई महिला ने आखिरकार चुप्पी तोड़ी और मामला ट्रायल कोर्ट से होते हुए हाईकोर्ट पहुंचा। वहां जस्टिस एम नागप्रसन्ना की सिंगल बेंच ने मामले को साफ पानी की तरह पारदर्शी कहते हुए पति पर रेप की धाराएं लगा दीं।

कोर्ट ने कहा कि अब वक्त आ गया है कि जब पति को अपनी पत्नी के शरीर और मन से मालिकाना हक छोड़ना होगा।

3 महीने पहले इस केस की खूब चर्चा हुई। ये भी सोचा जाने लगा कि शायद अब मैरिटल रेप झेलतीं महिलाओं के दिन बदलेंगे। हालांकि दिन बदलने में अभी सालों-साल या सदियां बाकी हैं। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाते हुए कार्रवाई ‘अगले आदेश तक के लिए’ रोक दी।

इस स्टे ऑर्डर के साथ ही शादीशुदा जीवन में रेप झेल रही स्त्रियों की किस्मत पर भी एक किस्म का स्टे लग गया। अब वे अपना दुख कहेंगी ही नहीं या आपस में फुसफुसाएंगी भी तो कुछ इस अंदाज में फैसला हो जाएगा- ‘स्त्री को ये सब सहना ही पड़ता है! मना नहीं करोगी तो भला जबर्दस्ती क्यों होगी!’

शादीशुदा संबंध में रेप कितना नया या कितना पुराना है, इस पर कोई रिसर्च नहीं मिलती। हो सकता है कि ये शादी जितना ही पुराना हो। जब 40 साल का विधुर अपनी 15 साल की नवेली पत्नी से हक जताने के नाम पर जबर्दस्ती कर जाए। या फिर मुश्किल प्रेग्नेंसी के 9 लंबे महीनों में पति का धीरज जवाब दे जाए।

खैर! चूंकि कोई लिखित प्रमाण नहीं तो ‘बेनिफिट ऑफ डाउट’ देते हुए इसे हम करीब साढ़े 400 साल पुराना मान लेते हैं।

साल 1736 में ब्रिटेन में इस तरह का पहला मामला आया, जहां एक पत्नी ने अपने पति पर रेप और क्रूरता का आरोप लगाते हुए इंसाफ की गुहार लगाई। तब वहां के जज लॉर्ड मैथ्यू हेल ने कहा, ‘पति किसी भी हाल में अपनी पत्नी से बलात्कार का दोषी नहीं हो सकता, क्योंकि शादी के साथ ही स्त्री ने अपना शरीर भी उसे सौंप दिया है। अब वो इससे पीछे नहीं हट सकती’।

ये वो वक्त था, जब महिलाओं को घर-जमीन खरीदने का हक नहीं था। यहां तक कि अगर वे कामकाजी हों, तो उनकी तनख्वाह भी पति को सौंप दी जाती। वे ही तय करते थे कि ‘अतिरिक्त पैसों’ का क्या करना है।

ये ब्रिटिश कानून था, जिसे बाकी गुलाम देशों ने भी कॉपी कर डाला। स्त्रियां असल में तब पुरुषों की प्रॉपर्टी हुआ करती थीं। ताकतवर पुरुष जैसे राजा, सामंत या ऊंचे ओहदे पर बैठे लोगों के पास एक-दो नहीं, कई पत्नियां होतीं, जो जाने-अनजाने उनकी दौलत का ही हिस्सा कहलातीं।

जैसे हर प्रॉपर्टी की कोई न कोई खूबी होती है, वैसे ही युवा लड़कियों की खूबी उनका कौमार्य था। टीन-एज में पहुंचते ही उनके अनछुएपन का पब्लिक में ऐलान होता। जिसमें पिता खुद अपनी बेटी को शादी तक सुरक्षित रखने की कसम खाता था। इस ऐलान को प्योरिटी बॉल के नाम से जाना जाता था।

जेसिका वेलेंट की किताब- द प्योरिटी मिथ में इस आयोजन का लंबा-चौड़ा जिक्र है कि कैसे सैकड़ों लोगों की भीड़ में ये समारोह होता। शादी के साथ ही युवती अपनी इस खासियत के साथ पति को सौंप दी जाती। इसके बाद पति की मर्जी! वो चाहे तो उसे प्रेम से रखे, चाहे उसके साथ बर्बर रहे।

मॉर्डन समझे जाते अमेरिका में अस्सी की शुरुआत में पता लगा कि 15% से ज्यादा महिलाएं शादीशुदा रिश्ते में रेप झेलती हैं। ये वो मामले थे, जो भिड़े दरवाजे और गिरे परदों के बाद भी छिप नहीं सके। जांच कमेटी ने माना कि असल मामले इससे कहीं ज्यादा होंगे।

साथ में एक मजाक चल निकला- आप अपनी पत्नी से भी रेप नहीं कर सकते, तो किसका रेप कर सकते हैं! ये अलग बात है कि अगले दशकभर में तमाम अमेरिकी राज्यों ने शादीशुदा रिश्ते में जबर्दस्ती को क्राइम मानते हुए इसकी सजा तय की।

वहां की अदालतों ने साफ कहा- जो चीज एक गैर-शादीशुदा लड़की के मामले में जबर्दस्ती कहलाती है, बिल्कुल वही चीज शादीशुदा स्त्री के मामले में छूट क्यों पाए! रेप, रेप है, चाहे वो अविवाहित लड़की के साथ अनजान पुरुष करे, या फिर शादीशुदा के साथ उसका पति।

इसके बाद से लेकर साल 2020 तक लगभग तमाम देशों ने शादी में जबर्दस्ती को रेप मानते हुए इसे क्राइम की लिस्ट में डाल दिया।

भारत उन 36 देशों में है, जहां मैरिटल रेप पर अब भी बहस चल रही है। शादी में रेप को अनसुना करने वालों का एक डर ये भी है कि पत्नियां इस कानून (अगर बन सका तो) का अपने पति के खिलाफ गलत इस्तेमाल न करने लगें!

दिल्ली हाईकोर्ट में इस मामले पर बात करते हुए जज सी हरिशंकर ने कहा- ‘अगर एक पति अपनी पत्नी से जबर्दस्ती करता है तो नैतिक तौर पर भले इसे गलत माना जाए, लेकिन इस पर वैसा गुस्सा नहीं आना चाहिए, जैसा रेप के उन मामलों में आता है, जहां अनजान पुरुष, किसी अनजान युवती से रेप करता है।’

ऐसे एक नहीं, अनेकों मामले आ चुके, जहां खुद कोर्ट ने रेप पीड़िता से शादी के लिए तैयार रेपिस्ट पर नरमी दिखाई। ज्यादा पुरानी बात नहीं, जब केरल के एक पादरी रॉबिन वडक्कमचेरी ने नाबालिग के रेप के बाद उससे शादी की पेशकश की थी। 52 साल के पादरी ने हाईकोर्ट पहुंचकर ‘शादी की तैयारी’ के लिए 2 महीने की बेल तक मांग डाली।

ये हिम्मत मामूली नहीं। ये वहीं से आती है, जहां शादी में रेप को जायज माना जाता है। जब तक बलात्कारी से शादी की सलाहें मिलती रहेंगी, तब तक शादी में बलात्कार भी जायज दिखता रहेगा।

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