बच्चों पर संवाद का असर- चंद्रशेखर तापी

कुछ शब्द बारबार जब हमारे मानस में आते हैं तो वे अपना स्थान मन में बना लेते हैं और इसका परिणाम यह होता है कि हम उसी के बारे में सोचने लगते हैं और परिणाम भी उसी प्रकार का होता है। इसलिए कहते हैं कि सोचो तो अच्छा सोचो और ऐसा सोचो कि जिससे जिंदगी में सुखमय और बड़े ध्येय की प्राप्ति हो सके।
विगत कुछ महिनों में बार बार अलग अलग तरीके से एक शब्द हमारे मन में आता है वो है ” लॉक डाऊन”। इसमें आता है “डाऊन” शब्द और इस विषय के बारे में लगातार घरों में भी चर्चा हो रही है। तो क्या हम हमेशा डाऊन के बारे में तो सोचने नहीं लगे? क्या हम हमेशा निराशा के बारे में तो सोचने नहीं लगे? इस संबंध में हमें सतर्क रहकर अपने जीवन के प्रगति के बारे में चिंतन करना चाहिए। “डाउन” शब्द से हमारे मन मे एक नकारात्मक भाव पैदा होता है इसलिए उत्थान के संदर्भ में सोचना चाहिए यानि “अप” के बारे में सोचना चाहिए । हमारे परिवार में जो चर्चा, बातचीत, संवाद होते हैं उसका बच्चों पर बहुत ज्यादा प्रभाव होता है इसलिए संवाद का विषय और भाषा सकारात्मक होंने के साथ प्रेरणास्पद हो यह हमें ध्यान रखना चाहिए। एक परिवार में बातचीत के दौरान जब पति-पत्नी यह कहते है कि यह बात तुम्हारे समझ से बाहर है तो बच्चे हमेशा उसे सुनते रहते हैं और जब कोई बात बच्चे से माता-पिता पूछते हैं तो बच्चे भी तुरंत कहने लगते है कि ये बात आप लोगों के समझ से बाहर है। ऐसी बात सुनकर मात-पिता को बहुत बुरा लगता है किन्तु यदि सोचा जाए कि आखिर यह बात बच्चे ने क्यों कही, तो पायेंगे कि उसे यह माता-पिता के बातचीत से ही सीखने मिला है। इसलिए घर में बच्चों को मात्र स्कूल /कॉलेज की पढ़ाई ही जरूरी नहीं है अपितु संस्कार और संवाद भी बेहतर हो इस दिशा में भी माता-पिता को जागृत रहना चाहिए। जब हम बच्चों का भविष्य उज्जवल और आनंद से परिपूर्ण करना चाहते हैं तो परिवार में भाषा और संवाद भी सही और सकारात्मकता लिए हुए होना चाहिए और वातावरण प्रसन्नता से परिपूर्ण होना चाहिए।
चंद्रशेखर तापी।
लेखक अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त आनंद प्रेरक वक्ता और पेरेन्टिग कोच हैं।

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