पापा आपको कैंसर है, घबराना नहीं

उनकी मौत के बाद खुद 2 साल डिप्रेशन में चली गई आपकी रतन राजपूत

मैं रतन राजपूत, बिहार की रहने वाली हूं। टीवी एक्ट्रेस के रूप में पहचान है मेरी। पापा राम रतन सिंह कमिश्नर थे और मां हाउस वाइफ। सब कुछ अच्छा अच्छा चल रहा था, फिर जिंदगी ने ऐसी करवट ली कि सब कुछ बदल गया। पहले मेरी दोस्त प्रत्युषा बनर्जी यानी बालिका वधू की मौत हुई, उसके बाद पापा चल बसे।

मुझे याद है प्रत्युषा की डेड बॉडी मेरे सामने रखी थी। एकदम शांत। पहली दफा किसी डेड बॉडी को इतने करीब से देख रही थी मैं। उसके बालों को अगर हाथ लगा दो, तो भनभना जाती थी। उस दिन पंखे की हवा से उसके बाल चेहरे पर आ रहे थे, लेकिन वो बेसुध पड़ी थी।

पापा को आखिरी सांस लेते हुए मैंने देखा था। तब डॉक्टर ने मुझसे कहा कि तुम उनकी मौत का सदमा नहीं झेल पाओगे, यहां से चले जाओगे, लेकिन मैं वहीं रही।

अभी काम के ऑफर आते हैं, लेकिन मना कर देती हूं। बस गांव, देहात और खेतों में घूमती रहती हूं। मौत से इतना डर गई हूं कि जिंदगी को हर पल जी लेना चाहती हूं। ऐसा लगता है जो है बस अभी है। कल मैं रहूंगी या नहीं मुझे नहीं पता।

बात उन दिनों की है जब मैं जय मां संतोषी की शूटिंग कर रही थी। आखिरी दिन था। हम सब लोग बहुत खुश थे। मैंने भाई से पहले ही बोल दिया था कि इस दफा छुट्टी में पटना नहीं आऊंगी, पहाड़ों पर घूमने जाऊंगी।

शाम के वक्त अपनी एक दोस्त के साथ ज्वेलरी की शॉपिंग कर रही थी। फोन पर डॉक्टर ने मुझे बताया कि पापा की तबीयत बहुत खराब है, बचने की कोई उम्मीद नहीं है, जल्दी आ जाओ। वो डॉक्टर मेरी कजिन भी है।

मैंने गहने वहीं रख दिए और भागी-भागी घर पहुंची। एयर टिकट लिया और सीधे पटना आ गई। वहां पहुंचने पर पता लगा कि पापा को आखिरी स्टेज का कैंसर है। मैंने ये बात मां-पापा और घर में भी किसी को नहीं बताई। मुझे लगा कि रोना-धोना मच जाएगा। पापा जीने की उम्मीद छोड़ देंगे।

मुझे यही लगता था कि मैं पापा को बचा लूंगी। पटना में पूरा चेकअप कराने के बाद डॉक्टर से कहा कि पापा को मुंबई ले जाना चाहती हूं, लेकिन डॉक्टर ने साफ मना कर दिया कि उन्हें दर्द है और वे ट्रैवल नहीं कर पाएंगे।

मैं नहीं मानी, तो डॉक्टर ने कहा कि वे अपनी विल पावर से मुंबई पहुंच सकते हैं, लेकिन उसके लिए कुछ कहानी गढ़नी होगी।

मैंने पापा से कहा कि एक लड़का पसंद किया है। आपसे मिलवाना है, मुंबई चलेंगे मेरे साथ? पापा तो जैसे पागल हो गए। बोले अरे..फोटो दिखाओ..हां..हां..जरूर चलेंगे, कब चलना है। अब मैं फंस गई कि फोटो किसका दिखाऊं।

एक टीवी एक्टर जो मेरा दोस्त भी है, उसने कहा कि मेरी दिखा दे। फोटो देखकर पापा तो जैसे झूम उठे। मैं उन्हें लेकर मुंबई आ रही थी, तभी फ्लाइट में उन्हें ऐसा दर्द हुआ जैसे उनकी जान निकल गई। इमरजेंसी लैंडिंग की नौबत आ गई।

मैं पापा से अपनी शादी की बातें करने लगी, पापा सुन रहे थे मेरी बात। क्रू पूछ रहा था कि इन्हें क्या हुआ है, मैं किसी को बता भी नहीं सकती थी कि पापा को कैंसर है, क्योंकि मां भी साथ थी।

खैर हम मुंबई पहुंचे। यहां से एंबुलेंस में पापा को सीधे अस्पताल लेकर गई। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया। बोले कि एक महीने से ज्यादा नहीं। मैंने फिर भी उम्मीद नहीं छोड़ी थी। अपने घर में से एल्युमिनियम और नॉन स्टिक पूरी तरह से हटा दिया। 4 लाख रुपए का मेडिकेटेड वाटर प्यूरीफायर लगवाया, आई-10 कार बेच दी, क्रेटा खरीदी ताकि पापा उसमें लेटकर जा सकें।

पूरी तरह से घर में ऑर्गेनिक, प्राकृतिक मसाले, सब्जियां आने लगीं। मैं पापा के लिए धर्मशाला के मैकलोडगंज से तिब्बती दवाई लेकर आती थी। यहां-वहां सब जगह फ्लाइट से आना-जाना। बस किसी तरह से पापा को बचाना था। पापा को अस्पताल से हमेशा से डर लगता था, तो मैंने घर को ही अस्पताल बना दिया।

पापा को जड़ी-बूटी, पानी, खाना जिसने जो सलाह दी, वो देना शुरू कर दिया। 24 घंटे पापा बस, और कुछ काम था ही नहीं मेरे पास। इसी बीच मां को गॉल ब्लैडर स्टोन्स हो गया। उनका भी ऑपरेशन करवाया।

एक दफा मैंने डॉक्टर से पूछा कि पापा को खाने में क्या दूं? उन्होंने कहा- कुछ भी दो, जाते हुए इंसान के लिए क्या चॉइस करना। पापा को रसगुल्ले बहुत पसंद थे, मैंने उन्हें रसगुल्ले खिलाने शुरू किए। एक दिन जब मैंने गूगल पर पढ़ा कि मीठा कैंसर की भूख है, तो मुझे खुद पर गुस्सा आया कि ये मैंने क्या कर दिया।

जिंदगी अस्पताल और एंबुलेंस में उलझकर रह गई थी। पापा के सामने हंसना, खूब बातें करना और अकेले में बाथरूम में जाकर रोना। दोहरी जिंदगी जी रही थी मैं। इसी में 3 महीने निकल गए। मैंने अभी तक पापा और मां को नहीं बताया कि पापा को कैंसर है। बहनों को पता लग चुका था। पापा की हालत दिन पर दिन खराब हो रही थी।

बहनों ने कहा कि पापा को कम से कम जाते हुए तो बता देना चाहिए कि उन्हें कैंसर है। मुझे भी लगा कि सारी जिंदगी इस बोझ तले नहीं जी पाऊंगी कि मैंने पापा को बताया नहीं, उनसे झूठ बोलती रही।

उस दिन मैं पापा के पास ही पाठ कर रही थी। डॉक्टर ने कहा कि आप यहां से चले जाओ, आप मर रहे इंसान को नहीं देख पाओगी। मैंने कहा कि मैं इन्हें इस वक्त अकेला नहीं छोड़ सकती। जहां तक होगा पापा के साथ रहूंगी। वह होश में थे, लेकिन कुछ बोल नहीं पा रहे थे। मैंने उनसे कहा कि पापा आपको कैंसर है, घबराना मत, जाओ, आप आराम से जाओ और पापा चले गए।

जाते-जाते पापा मुझे पूरी तरह से बदल गए। 2 साल डिप्रेशन में रही। फिर कुछ थैरेपी ली। खुद को प्रकृति से जोड़ा, खेत-खलिहानों में घूमने लगी। भारत के गांवों में जाकर रहने लगी। मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाने लगी, जिंदगी से कई चीजें और कुछ लोग हमेशा के लिए हटा दी।

अब आपको थोड़ा पीछे ले चलती हूं।

रतन राजपूत बनने की कहानी बताती हूं। मैं 5 बहनों में सबसे छोटी थी। एक दिन पता लगा कि मेरा नाम एक पड़ोसी ने रखा है, तो पापा पर बहुत गुस्सा आया। मैंने अपना नाम बदल लिया। मुझे लगा कि कम से कम लड़कों वाला नाम तो रख ही सकती हूं। इसके बाद बहन के पास दिल्ली आ गई। पापा से कहा कि अब यहीं पढ़ूंगी, लेकिन उन्हें क्या पता था कि डांस करने जा रही हूं।

हमारे यहां डांस या एक्टिंग को अच्छा नहीं माना जाता था। कथक सीखने गई, तो गुरु जी बोले कि अच्छा डांस करती हो, लेकिन अब बड़ी हो गई हो। कम उम्र में आई होती, तो अच्छा होता। उस दिन मैं खूब रोई।

इसके बाद थिएटर करने लगी। मंडी हाउस में कई नाटक किए। वहां भी पैसे नहीं मिलते थे। मैंने गुरुजी से कहा कि इसके बाद क्या? बस नाटक हो जाता है और लोग ताली बजा देते हैं।

गुरु जी ने कहा कि मुंबई चली जाओ। इसके बाद मैं मुंबई आ गई। सब सामान साथ लेकर आई थी कि यहां एक बर्तन भी खरीदना नहीं पड़े। कुछ दिन गेस्ट हाउस में रही। फिर मुझे वहां से निकाल दिया गया। इसके बाद मेरे स्ट्रगल की शुरुआत हुई। यहां-वहां हर जगह भटकी।

कई दफा मकान का किराया नहीं होता था देने के लिए। रूममेट कहती थी कि आज किराया दोगी, तो ही रूम पर आना। टीवी सेट पर देखती थी कि सभी एक्ट्रस की ड्रेस दूसरे लोग टांगा करते थे, लेकिन मेरी ड्रेस कोई नहीं टांगता था। टीवी सेट पर सिर्फ मैं ही ऐसी होती थी, जिसके कपड़े बहुत रीपीट होते थे। मैं सोचती थी कि पैसे होंगे, तो सबसे पहले कपड़े खरीदूंगी।

अपने टिफिन में हर दिन न्यूट्रिला राइस लेकर जाती थी। संकोच करते हुए अपना टिफिन खोलती थी, क्योंकि सभी लोग बदल-बदल कर खाना लाते थे। एक दफा तो पहली बार मैंने बहुत फैशनेबल बुफे देखा। दाल-सब्जी के नाम अजीबो-गरीब, सभी की प्लेट भरी हुई थी, मेरी खाली। समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या खाना है।

ऐसे दिन देखे हैं मैंने मुंबई में, लेकिन जब भी पापा का फोन आता था, तो जोश में उन्हें बताती थी कि हां सब मस्त चल रहा है, भर पेट खाना खाया, बहुत मौज-मस्ती की। सब ठीक है। अगर पापा को असलियत बता देती तो वो एक दिन भी मुंबई में नहीं रहने देते।

पापा पटना में अपने दोस्तों को बताते थे कि रतन मुंबई में एक्टिंग सिखाती है। मुझे यह जानकर बहुत गुस्सा आया और तकलीफ भी हुई। गुस्सा इसलिए आया कि पापा झूठ क्यों बोले और तकलीफ यह कि मेरी वजह से उन्हें झूठ बोलना पड़ रहा है।

जब मेरा पहला टीवी सीरियल आया तो सब लोग घर में टीवी के सामने बैठ गए मुझे देखने के लिए। पापा का फोन आया। बहुत खुश थे। बोले कि अरे बेटा तुम रुकी क्यों नहीं, ट्रे लेकर चली ही गई, अरे रुकना चाहिए था न, बात करनी चाहिए थी, तब ही तो हम तुम्हें देखते। पापा को क्या समझाती कि वो पासिंग सीन था, मेरे हाथ में नहीं कि मैं स्क्रीन पर कितना दिखूंगी। इतने भोले थे वो।

एक दफा पापा से यादगार कहासुनी हुई थी। राधा की बेटियां कुछ कर दिखाएंगी के सेट पर बात हो रही थी कि गोरेगांव के इंपीरियल हाइट्स में 7,000 में फ्लैट मिल रहा है। यह सुनकर मैं पागल हो गई। मैंने कहा कि मैं भी लूंगी। फिर पता चला वो 7,000 प्रति स्क्वायर फीट है। इस हिसाब से 70 लाख का हुआ। मुझे कुछ पता तो था नहीं।

मैंने सीधे पापा को फोन मिला दिया कि पापा 70 लाख चाहिए। पापा ने साफ मना कर दिया। मैंने भी मान लिया कि पापा के पास नहीं होंगे। राधा की बेटियां, अगले जन्म मोहे बिटिया ही कीजो, स्वयंबर जैसे सीरियल करने के बाद जब मैंने पैसे कमा लिए तो उसी 70 लाख वाले फ्लैट को 2 करोड़ रुपए में खरीदा।

एक दिन मुझे पता लगा कि पापा के पास पैसे थे, लेकिन उन्होंने मुझे नहीं दिए। एक रोज वो मेरी तारीफ कर रहे थे कि देखो कितनी अच्छी है हमारी बेटी, कभी हमसे मांगी नहीं, सब अपने ही किया। मैं उनसे लड़ पड़ी कि आपने क्यों मुझे कभी पैसे नहीं दिए क्योंकि मैं लड़की थी, आपको हमेशा लगता था मैं बेटा नहीं हूं, इसलिए वापस नहीं करूंगी। बेटी हूं इसलिए मुझ पर भरोसा नहीं किया। ओह..कितना लड़ी थी मैं पापा से।

एक दफा तो एक सेट पर दूसरे सीन की तैयारी में अंधेरा हो गया। इसका फायदा उठाकर लाइटमैन मुझे गलत तरह से छूने लगा। मैंने उसका हाथ दबोच लिया और लाइट आने तक दबोचे ही रखा। लाइट आने पर मैंने उससे पूछा कि क्या कर रहा था? उसने भौंहे चढ़ाकर हंसते हुए कहा- क्या कर रहा था? मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर था। मैंने उसे मारना शुरू कर दिया। सभी ने उसे मुझसे छुड़ाकर भगा दिया।

मैंने एक मेल एक्टर को करके दिखाया कि उसने मेरे साथ क्या किया था, लेकिन सभी ने कहा कि अरे वो शादीशुदा है, गरीब है, ऐसा नहीं कर सकता है। मैं सेट से मेकअप रूम में चली गई और बाहर नहीं आई। फिर पता लगा कि उसे निकाल दिया गया, लेकिन फिर भी सभी ने उसका ही पक्ष लिया।

एक बार ऑडिशन में बहुत बड़े ओहदे पर बैठे बुजुर्ग ने मुझे प्रपोज किया। मैंने उससे कहा कि आप मेरे पापा की उम्र के हैं, तो कहने लगा कि मेरी बेटी भी एक्ट्रेस होती तो मैं उसके साथ भी सो सकता था। डर के मारे मैं कई महीने ऑडिशन देने ही नहीं गई।

पापा को अगर ये बात बताती, तो मुझे एक सेकेंड भी वहां रुकने नहीं देते। इसलिए अकेले रोने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। पापा की इज्जत का डर, उनकी बातों का डर, समाज का डर, रिश्तेदारों का डर, भूख का डर, काम न मिलने का डर सब कुछ झेली हूं।

पापा के जाने के बाद सारे डर खत्म हो गए हैं। अब भूख से मरने का भी डर नहीं है। मेरे पास इतने पैसे हैं कि मैं सम्मानजनक जीवन जी सकती हूं। आज भी काम आता है, लेकिन अभी एक साल मैं अपने आपको दूंगी। थक गई हूं। कुछ आराम करना चाहती हूं।

पढ़ाई-लिखाई में कभी भी अच्छी नहीं थी। बस शादी के लिए पढ़ रही थी। शादी का मुझे बहुत शौक भी था। पायल-बिछिया पहनूंगी, खाना बनाऊंगी, पति ऑफिस जाएंगे बस यही जिंदगी है, लेकिन शादी हो न सकी।

अभिनव के साथ एक साल रिलेशनशिप में रही, लेकिन चीजें आगे नहीं बढ़ सकीं। किसी भी रिश्ते के टूटने से अच्छा तो नहीं लगता है, दो साल उस वजह से भी मैं डिप्रेशन में चली गई। अब तो ऐसी हो गई हूं कि कोई जीवन में आए तो आए न आए तो शादी जरूरी नहीं रही मेरे लिए।

मुझे आज भी याद है राधा की बेटियां का प्रोमो शूट होना था। मेरे पास सिर्फ 50 रुपए थे। स्टूडियो जाने के लिए मैं कभी ऑटो से गई तो कभी बस से तो कभी काफी दूर तक पैदल चली। बहुत कुछ झेला है मैंने मुंबई में अपना मुकाम बनाने के लिए।

सोचा था कि पापा के साथ बेटी का रिश्ता रहा है। अब दोस्त बनूंगी पापा की, क्योंकि 5 बच्चों को पालना आसान नहीं था, लेकिन जब इस काबिल हुई तो पापा ही नहीं रहे।

रतन राजपूत ने ये सारी बातें भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से शेयर की हैं।

चलते-चलते संडे जज्बात सीरीज की ये 3 कहानियों से होकर भी गुजर जाइए

1. तुम औरतों को क्या पता मजहब क्या होता है:घर में रहो, बच्चे पैदा करो; काजी का काम हम मर्दों के लिए छोड़ दो

काजियों ने तीन तलाक के बहाने औरतों की हालत भिखारी जैसी कर दी थी। वे न तो लड़की की उम्र देखते न लड़के की उम्र। तलाक को मजाक समझ रखा था। मैंने कहा कि बस अब बहुत हो गया। हम न सरकार से हक मांगेंगे न काजियों के पास जाएंगे। अपनी लड़ाई खुद लड़ेंगे। महिला काजी बनाएंगे। कुरान और संविधान इसकी इजाजत देता है। बस यही से मेरी काजी बनने की जर्नी शुरू हुई। (पढ़िए पूरी कहानी)

2. किन्नर से महामंडलेश्वर बनी, आज भी भीड़ में लोग हाथ दबा देते हैं, सोशल मीडिया पर बोलते हैं- अच्छी वाली फोटो भेजो

मेरे भाई ने ही मेरा यौन शोषण किया। तीन बार आत्महत्या की कोशिश की। घर में काफी मार-पीट हुई। प्यार भी किया, लेकिन वफा के नाम पर मुझे धोखा मिला, वो भी चार दफा। फिर मोह माया छोड़कर निकल पड़ी अपनी नई दुनिया बनाने। जूना अखाड़े के हरिगिरी महाराज से दीक्षा ली और संन्यासी बन गई। अब मैं किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर हूं, नाम है पवित्रानंद नीलगिरी।

3. पुलिस ने झूठे केस में फंसाया, प्राइवेट पार्ट पर करंट लगाया; पेशाब के वक्त जलन ऐसी कि गला फाड़कर चिल्लाने लगता

16 साल पहले की बात है। मुंबई लोकल ट्रेन बम ब्लास्ट में 200 से ज्यादा लोग मारे गए थे। 700 के करीब घायल हुए थे। मुझे महाराष्ट्र ATS ने झूठे केस में फंसा दिया। 9 साल जेल में रहा। मुझ पर इतने जुल्म किए कि आज भी याद करके रूह कांप जाती हैं। शरीर का शायद ही कोई हिस्सा होगा, जिस पर जख्मों के निशान न हों। वो तो शुक्र है अदालत का कि मैं बेगुनाह निकला।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *