नक्शे पर भारतीय इलाकों को अपना दिखाता रहा, भारत ने पूछा तो बोला- नया नक्शा बनाने का टाइम नहीं; 63 साल पहले बिना बताए अक्साई चिन से हाईवे निकाला

नई दिल्ली. भारत-चीन के बीच 42 दिन से जारी तनाव अब गहराता जा रहा है। सोमवार रात लद्दाख के पास गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प में भारत के 20 जवान शहीद हो गए। इस झड़प में चीन के भी 43 सैनिकों के हताहत होने की खबर है, लेकिन चीन ने अभी तक इसे कबूला नहीं है।

पिछले महीने 5 मई को पूर्वी लद्दाख में दोनों सेनाओं के 200 सैनिक आमने-सामने आ गए थे। तनाव बढ़ने लगा था। फिर दोनों देशों के बीच बातचीत भी हुई और तनाव थोड़ा कम भी हुआ। लेकिन, सोमवार रात को हिंसक झड़प होने के बाद तनाव अब और बढ़ गया है।

लेकिन, ये पहली बार नहीं है जब चीन ने इस तरह की हरकत की हो। चीन में कम्युनिस्ट सरकार आने के 10 साल बाद से ही भारत-चीन के बीच सीमा विवाद शुरू हो गया था और इसकी शुरुआत भी चीन ने ही की थी। इसका नतीजा ये हुआ कि भारत तो हिंदी-चीनी भाई-भाई करता रहा, लेकिन चीन बार-बार झगड़ा करने की फिराक में लगा रहा।

चीन की 10 हरकतें
1. अपने नक्शों में भारतीय इलाके दिखाए
भारत और चीन के बीच 1 अप्रैल 1950 से डिप्लोमैटिक रिलेशन हैं। 1949 से लेकर 1958 तक चीन ने कभी सीमाओं को लेकर आपत्ति नहीं जताई। हालांकि, 1954 में चीन की एक किताब ‘अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ मॉडर्न चाइना’ में छपे नक्शे में चीन ने लद्दाख को अपना हिस्सा बताया।

बाद में जुलाई 1958 में भी चीन से निकलने वालीं दो मैगजीन ‘चाइना पिक्टोरियल’ और ‘सोवियत वीकली’ में भी चीन ने अपना जो नक्शा छापा, उसमें भारतीय इलाकों को भी शामिल किया गया। भारत ने दोनों ही बार इस पर आपत्ति जताई। लेकिन, चीन ने ये कह दिया कि ये नक्शे पुराने हैं और उनकी सरकार के पास नक्शे ठीक करने का समय नहीं है।
2. हमारे इलाकों में ही हमारी सेना की तैनाती पर आपत्ति
1954 में चीन ने उत्तरप्रदेश के बाराहोती इलाके में भारतीय सैनिकों की तैनाती पर आपत्ति जताई। उस समय उत्तराखंड नहीं था और ये इलाका उत्तरप्रदेश में ही था। चीन का कहना था कि बाराहोती उसका हिस्सा है, जिसे वो वू-जी नाम से बुलाता था। इसके बाद चीन ने भारतीय इलाकों में घुसपैठ शुरू कर दी।

सितंबर 1956 में चीनी सैनिकों ने शिपकी-ला इलाके (अरुणाचल) में घुसपैठ की। जुलाई 1958 में चीनी सैनिकों ने लद्दाख के पास खुरनाक किले पर कब्जा कर लिया। सितंबर-अक्टूबर 1958 में चीन अरुणाचल प्रदेश के लोहित फ्रंटियर डिविजन के अंदर तक आ गया। भारत ने हर बार आपत्ति जताई।

3. बिना बताए ही भारतीय इलाके में सड़क बना दी
अखबार के माध्यम से भारत को पता चला कि चीन ने शिंजियांग से लेकर तिब्बत के बीच एक हाईवे बनाया है। इसकी सड़क अक्साई चिन से भी गुजरी है, जो भारतीय हिस्से में है। इसे कन्फर्म करने के लिए 1958 की गर्मियों में भारत ने दो टीम अक्साई चिन भेजी। चीन ने पहली टीम को तो गिरफ्तार ही कर लिया।

दूसरी टीम जो लौटकर आई, उसने बताया कि शिंजियांग-तिब्बत हाईवे बनकर तैयार है और उसकी सड़क अक्साई चिन से भी गुजर रही है। इस पर भारत ने 18 अक्टूबर 1958 को चीन को लेटर भी लिखा। चीन का जवाब आया कि जो हाईवे बना है, वो पूरी तरह से चीन के हिस्से में है।

4. चीन के राष्ट्रपति ने भारतीय इलाकों को अपना हिस्सा बताया
पूरी स्थिति पर उस समय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने चीन के राष्ट्रपति झोऊ इन-लाई को पत्र लिखा। इस पर झोऊ ने 23 जनवरी 1959 को जवाब दिया और सीमा विवाद का मुद्दा उठाते हुए दावा किया कि उसका 5 हजार स्क्वायर मील (करीब 13 हजार स्क्वायर किमी) का इलाका भारतीय सीमा में है। ये पहली बार था जब चीन ने आधिकारिक रूप से सीमा विवाद का मुद्दा उठाया। झोऊ ने ये भी कहा कि उनकी सरकार 1914 में तय हुई मैकमोहन लाइन को भी नहीं मानता।

मैकमोहन लाइन 1914 में तय हुई थी। इसमें तीन पार्टियां थीं- ब्रिटेन, चीन और तिब्बत। उस समय ब्रिटिश इंडिया के विदेश सचिव थे- सर हेनरी मैकमोहन। उन्होंने ब्रिटिश इंडिया और तिब्बत के बीच 890 किमी लंबी सीमा खींची। इसे ही मैकमोहन लाइन कहा गया। इस लाइन में अरुणाचल प्रदेश को भारत का हिस्सा ही बताया था।

हालांकि, आजादी के बाद चीन ने दावा किया कि अरुणाचल तिब्बत का दक्षिणी हिस्सा है और क्योंकि तिब्बत पर अब उसका कब्जा है, इसलिए अरुणाचल भी उसका हुआ। जबकि, भारत का कहना है कि जो भी ब्रिटिशों ने तय किया था, वही भारत भी मानेगा।

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