खासगी ट्रस्ट भ्रष्टाचार में एक और खुलासा:हरिद्वार में कुशावर्त घाट की जमीन में करोड़ों का खेल

इंदौर के खासगी ट्रस्ट द्वारा मप्र की देश में स्थित बेशकीमती जमीनों में किए गए सामने आया है। ट्रस्ट के मुख्य ट्रस्टी सतीश चंद्र मल्होत्रा ने हरिद्वार के कुशावर्त घाट और इससे सटे होल्कर बाड़े को बेचने के लिए नियमों को ताक पर रखकर मनमर्जी की। इस संबंध में हरिद्वार के कोतवाली थाने में एक एफआईआर (नंबर 0313/2019) 9 अप्रैल 2019 को दर्ज कराई गई। इसके मुताबिक 2007 में मल्होत्रा ने घाट और होल्कर बाड़े की 13370 वर्गफीट की जमीन की पावर ऑफ अटॉर्नी कूट रचित दस्तावेजों के आधार पर राघवेंद्र सिखौला नामक शख्स के नाम कर दी थी। उस समय तक मल्होत्रा के पास किसी को भी पावर ऑफ अटॉर्नी बनाने का अधिकार नहीं था। फिर भी उन्होंने ऐसा किया।

हालांकि सिखौला उनसे बड़ा खिलाड़ी निकला। उसने दो साल बाद इस बेशकीमती जमीन की रजिस्ट्री अपनी पत्नी निकिता सिखौला और भाई अनिरुद्ध सिखौला के नाम कर दी। यह रजिस्ट्री 24 अप्रैल 2009 और 2 सितंबर 2009 को हरिद्वार के निबंधक कार्यालय में हुई। इसके बाद निकिता और अनिरुद्ध ने घाट और होल्कर बाड़े का कब्जा ले लिया और यहां बना प्राचीन शिव मंदिर आम जनता के लिए बंद कर दिया। मंदिर बंद होने की शिकायत अखिल भारतीय पाल महासभा ने गढ़वाल आयुक्त कुणाल शर्मा से की। उन्होंने तीन साल जांच की। 2012 में घाट बिकने की जानकारी साजर्वजनिक हुई और शर्मा ने 25 मई 2012 को अपनी रिपोर्ट उत्तराखंड सरकार को सौंपते हुए मामले की सीबीआई से जांच कराने की सिफारिश की थी।

काला सच यह भी… ट्रस्ट पहले ही कर चुका था घाट का सौदा
एफआईआर के मुताबिक 23 अगस्त 2007 को ट्रस्ट के समक्ष मल्होत्रा ने एक प्रस्ताव रखा। इसके मुताबिक ट्रस्ट से जुड़े मामलों की पैरवी के लिए कर्मचारी को नियुक्त किया जाए। प्रस्ताव मंजूर हुआ और नियुक्ति का अधिकार मल्होत्रा को मिला। लेकिन, इसमें खरीद-फरोख्त शामिल नहीं थी। इसलिए सिखौला को सिर्फ पावर ऑफ अटॉनी बनाया गया था। लेकिन, सिखौला ने पत्नी-भाई के नाम रजिस्ट्री कर दी। सबसे बड़ी बात ये कि मल्होत्रा को नियुक्ति का अधिकार मिलने से पहले ही ट्रस्ट 8 फरवरी 2007 को अनिरुद्ध के साथ कुशावर्त घाट की बिक्री का सौदा 50 लाख रु. में कर चुका था। इसके एवज में 15 लाख रु. एडवांस भी लिए जा चुके थे।

खासगी पर आईएएस श्रीवास्तव की जांच रिपोर्ट कैसे आई सात साल बाद बाहर
खासगी ट्रस्ट की संपत्ति के घालमेल का खुलासा सीनियर आईएएस व पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अपर मुख्य सचिव की जिस जांच रिपोर्ट में हुआ, वह सात साल तक फाइलों में दबी रही। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद नैनीताल हाईकोर्ट में एक याचिकाकर्ता विजय सिंह पाल ने यह रिपोर्ट रखी। यह उन्हें मप्र के अपने स्त्रोतों से प्राप्त हुई थी। मप्र हाईकोर्ट में सुनवाई चली तो विजयसिंह बतौर मध्यस्थ यह रिपोर्ट लेकर सामने आए। जबकि मनोज श्रीवास्तव ने अपनी जांच रिपोर्ट तत्कालीन मुख्य सचिव को 2 नवंबर 2012 को ही दे दी थी। तब से लेकर यह रिपोर्ट पड़ी रही। इसी दौरान ही इंदौर से सांसद रहीं सुमित्रा महाजन ने तत्कालीन इंदौर कलेक्टर आकाश त्रिपाठी को पत्र लिखकर बताया कि हरिद्वार का कुशावर्त घाट अवैधानिक तरीके से बेच दिया गया। इसी पत्र के तुरंत बाद ही 5 नवंबर 2012 को तत्कालीन त्रिपाठी ने देशभर के कलेक्टरों को पत्र लिखकर कहा कि खासगी ट्रस्ट की संपत्तियां मप्र सरकार की हैं। यह ट्रांसफर नहीं हो सकतीं।

2014 से मप्र में थी इस पर चुप्पी
हाईकोर्ट की सिंगल बैंच के न्यायाधीश रहे एनके मोदी ने 28 नवंबर 2013 को रिटायरमेंट से एक दिन पहले खासगी ट्रस्ट के पक्ष में फैसला दिया कि वह संपत्तियाें अधिकारी है। इसके बाद 2014 में राज्य सरकार ने रिट पिटीशन दायर की, लेकिन तब से लेकर यह केस कभी लिस्ट ही नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद 18 अक्टूबर 2019 को इसे अर्जेंट सुनवाई में लिया गया।

ट्रस्ट डीड के समय कमिश्नर थे एमपी श्रीवास्तव जो बाद में मुख्य सचिव बने
खासगी संपत्ति की देखभाल के लिए 27 जून 1962 में बने ट्रस्ट में छह ट्रस्टी रखे गए। इसमें अध्यक्ष ऊषा देवी होल्कर बनीं। ऊषा देवी द्वारा नामित दो सदस्य थे। राज्य सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर दो सदस्य थे और एक सदस्य भारत सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर था। तब ऊषा देवी के अलावा एसवी कानूनगो, एमपी श्रीवास्तव, माधव प्रसाद, केए चिताले और एससी मल्होत्रा ट्रस्टी बने।

इसके बाद 8 मार्च 1972 में जब सप्लीमेंट्री डीड बनी, तब कुछ चेहरे बदल गए। एमपी श्रीवास्तव मप्र के मुख्य सचिव बनने के कारण हटे, क्योंकि ट्रस्ट में इंदौर कमिश्नर पदेन सदस्य था। इस दौरान ऊषा देवी, केए चिताले व एससी मल्होत्रा तो बरकरार रहे, लेकिन नए ट्रस्टियों में भारत सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर पीएस बापना, इंदौर के तत्कालीन कमिश्नर केएल अग्रवाल और पीडब्ल्यूडी के अधीक्षण अभियंता केएस श्रीनिवासन ट्रस्टी बनाए गए। सप्लीमेंट्री डीड के गवाह बने एमएम जगदाले और जीवी तमहाने।

आगे क्या : घाट बिक्री की नए सिरे से हो सकती है जांच

यह एफआईआर हरिद्वार के रहने वाले विजय पाल सिंह ने दर्ज कराई थी। इसमें मल्होत्रा, राघवेंद्र, अनिरुद्ध, निकिता के खिलाफ धारा 420, 120 बी, 427, 468, 471 और 506 में मुकदमा दर्ज हुआ था, लेकिन दिसंबर 2019 में हरिद्वार पुलिस ने कोर्ट में इसका खात्मा लगा दिया था। इसके बाद आरोपियों ने फरियादी पर झूठी शिकायत का केस दर्ज कराया था।
फरियादी विजय पाल ने फरवरी 2020 में खात्मा रिपोर्ट को कोर्ट में चुनौती है, जो एडमिशन के बाद लंबित हैं।
अब विजय का कहना है कि लाॅकडाउन में सुनवाई नहीं हो सकी, लेकिन इंदौर हाईकोर्ट के फैसले के बाद खात्मा रिपोर्ट का अस्तित्व नहीं बचा है, इसलिए यह मामला फिर से खुल सकता है।
हरिद्वार के कोतवाली थाना प्रभारी अमरजीत सिंह से दैनिक भास्कर को बताया कि हाईकोर्ट के आदेश की कॉपी मिलने के बाद इस केस में दोबारा नए सिरे से जांच कराई जा सकती है।
बिचौलियों की भी भूमिका… ट्रस्ट ने नहीं सौंपा ईओडब्ल्यू को रिकॉर्ड और संपत्ति

खासगी ट्रस्ट के दफ्तर पर ईओडब्ल्यू के छापे के बाद भी ट्रस्टियों ने अब तक कोई जानकारी या दस्तावेज उपलब्ध नहीं करवाए हैं। इस पर अफसरों ने शुक्रवार को संभागायुक्त और कलेक्टर कार्यालय से संपत्तियों से जुड़े दस्तावेज हासिल किए। इसमें एक नया बिंदु सामने आया है कि संपत्ति को बेचने में ट्रस्ट ने कुछ बिचौलियों की मदद भी ली। इनमें कुछ इंदौर के हैं तो कुछ बाहर के। उनकी जानकारी निकाली जा रही है। शेष | पेज 9 पर

एसपी धनंजय शाह के मुताबिक ट्रस्टी नीरव भटनागर कॉल रिसीव नहीं कर रहे।
सुप्रीम कोर्ट में अगले सप्ताह सुनवाई : ट्रस्टी सतीश मल्होत्रा की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में अगले हफ्ते सुनवाई होगी। बताते हैं ट्रस्ट ने हाई कोर्ट के आदेश पर स्थगन हासिल करने के लिए दिल्ली के सीनियर वकीलों की टीम खड़ी कर दी है।

खासगी की कहानी- 58 साल पहले ट्रस्ट बना, 71 साल पहले संपत्ति का विलय
सात मई 1949 के बाद खासगी प्रॉपर्टी के रूप में अंकित तमाम संपत्ति और उससे होने वाली आय मध्यभारत सरकार में शामिल हो गईं। इस समय होल्कर स्टेट के शासक यशवंत राव होल्कर रहे। मध्य भारत राज्य का उत्तराधिकारी राज्य एक नवंबर 1956 में मप्र बना। पहली ट्रस्ट डीड जो 27 जून 1962 में बनी, उसमें यह स्वीकार भी किया गया कि संपत्ति मप्र सरकार की है। इस संपत्ति के मेंटेनेंस और संरक्षण के लिए दो लाख 91 हजार 952 रुपए देना तय हुआ। यह ट्रस्ट को दी जानी थी, लिहाजा इसके लिए 27 जून 1962 को ट्रस्ट डीड का निर्माण हुआ। इसी माध्यम से राशि खर्च होनी थी। इसी ट्रस्ट डीड में लिखा गया कि संपत्ति को बेचने का अधिकार ट्रस्ट को नहीं है। सप्लीमेंट्री डीड 1972 में सरकार की बिना मंजूरी के इसलिए लाने की कोशिश हुई, ताकि संपत्ति बेची जा सके। इसे ही चुनौती मिली है।

इससे पहले 5 दिसंबर 1961 में महाराजा यशवंत राव होल्कर का निधन हो गया। उनकी जगह महारानी ऊषा देवी को शासक माना गया। ऊषा देवी ट्रस्ट की अध्यक्ष बनीं। राज्य सरकार के दो और भारत सरकार के एक प्रतिनिधि को भी ट्रस्ट में रखा गया। 10 अगस्त 1971 से पहले तक इस ट्रस्ट डीड या संपत्ति को लेकर कोई भ्रम नहीं था। इसका प्रमाण 23 सितंबर 1969 को ट्रस्ट की ओर से रजिस्ट्रार ऑफ पब्लिक ट्रस्ट को भेजे गए आवेदन में भी मिलता है।

मार्च 1972 से हुई गड़बड़ी की शुरुआत
इंदौर लोक न्यास के पंजीयक ने 10 अगस्त 1971 को एक फैसला सुनाया कि यह ट्रस्ट राज्य सरकार के अधीन है, इसलिए इसे पंजीयन से छूट की पात्रता रहेगी। लेकिन खास बात यह थी कि ट्रस्ट के पांच सदस्यों में सिर्फ दो ही राज्य सरकार के प्रतिनिधि थे। लिहाजा हर निर्णय में राज्य सरकार अल्पमत में थी। इसी के बाद असली गड़बड़ी शुरू हुई, जब एक मार्च 1972 को सप्लीमेंट्री डी़ड बनाई गई। यह गलत थी। शासन की इसमें कोई अनुमति नहीं थी।

खासगी यानी राजा की संपत्ति
रियासतों के विलय के समय होल्कर की संपत्ति को खासगी कहा गया। महाराष्ट्रीयन भाषा में इसे राजा की संपत्ति कहते हैं। इसीलिए जब संपत्ति के रखरखाव व संधारण की बात आई तो खासगी ट्रस्ट सामने आया।

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