केंद्र vs बंगाल:भाजपा नेताओं की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का ममता सरकार को नोटिस, कहा- अगली सुनवाई तक कोई एक्शन न लें

बंगाल में भाजपा नेताओं पर क्रिमिनल केस दर्ज करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को सुनवाई हुई। इसमें कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को नोटिस जारी कर आदेश दिया है कि अगली सुनवाई तक प्रदेश में भाजपा नेताओं पर सख्ती न की जाए। मामले की अगली सुनवाई जनवरी में होगी।

यह याचिका बीजेपी के बंगाल प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय, सांसद अर्जुन सिंह और अन्य लोगों ने दायर की है। इसमें कहा गया है कि बंगाल में उनके ऊपर चल रहे केस रद्द किए जाएं या उन्हें दूसरे राज्यों में ट्रांसफर किया जाए। याचिका में कहा गया है कि ये केस झूठे और जानबूझकर लगाए गए हैं।

तृणमूल के एक और विधायक ने छोड़ी पार्टी

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। एक तरफ भाजपा उनकी घेराबंदी में जुटी है, वहीं, करीबी साथी उनका साथ छोड़ रहे हैं। शुक्रवार को पार्टी के एक और विधायक शीलभद्र दत्ता ने पार्टी छोड़ दी।

शुभेंदु अधिकारी और जितेंद्र तिवारी के बाद दत्ता पार्टी छोड़ने वाले तीसरे विधायक हैं। अधिकारी ने विधानसभा से भी इस्तीफा दिया था। तीनों ने पिछले तीन दिन में ही ममता से किनारा किया है। TMC के एक और नेता कबीरुल इस्लाम ने पार्टी की माइनोरिटी सेल के जनरल सेक्रेटरी की पोस्ट से इस्तीफा दे दिया है।

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शाम 6.30 बजे लॉ एंड ऑर्डर पर मीटिंग

आज शाम 6.30 बजे केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए मीटिंग करेंगे। इसमें राज्य में लॉ एंड ऑर्डर पर बात होगी। पहले इस मीटिंग के लिए केंद्र सरकार ने बंगाल के मुख्य सचिव और पुलिस चीफ को दिल्ली तलब किया था। उन्हें आज शाम 5.30 बजे तक पेश होने का आदेश था।

जवाब में राज्य सरकार ने कोरोना के कारण वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए मीटिंग का सुझाव दिया। इसे मान लिया गया। BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर हमले के बाद केंद्र ने पिछले हफ्ते भी दोनों अधिकारियों को तलब किया था। तब राज्य सरकार ने अधिकारियों को भेजने से इनकार कर दिया था।

CM ममता बनर्जी ने मीटिंग बुलाई

विधायकों के लगातार साथ छोड़ने से परेशान ममता बनर्जी ने आज एक मीटिंग बुलाई है। हालांकि, पार्टी के सूत्रों का कहना है कि यह इमरजेंसी नहीं, रेग्युलर मीटिंग का ही हिस्सा है। हर शुक्रवार को पार्टी चेयरपर्सन नेताओं से मिलती हैं।

किसान आंदोलन का 23वां दिन:किसान बोले- प्रधानमंत्री को हमसे बात करनी चाहिए; कृषि कानूनों का विरोध नहीं छोड़ेंगे
तीन नए कृषि कानूनों के विरोध में किसान आंदोलन का आज 23वां दिन है। किसान कानून वापसी की मांग पर अड़े हैं। दिल्ली के सिंघु बॉर्डर पर आंदोलन कर रहे किसानों ने कहा है कि प्रधानमंत्री को उनसे बात करनी चाहिए। कृषि कानूनों के खिलाफ अपनी लड़ाई नहीं छोड़ेंगे।

अपडेट्स

चिपको आंदोलन के नेता सुंदरलाल बहुगुना ने किसान आंदोलन को समर्थन दिया है। बहुगुना ने वीडियो रिलीज कर कहा- मैं अन्नदाताओं की मांगों का समर्थन करता हूं। देश की खाद्य सुरक्षा देने में किसान देश के असली हीरो हैं।
किसानों का कहना है कि वे कृषि कानूनों के खिलाफ लंबी लड़ाई की तैयारी कर रहे हैं। ठंड को देखते हुए ज्यादा टेंट लगा रहे हैं।
उद्योग संगठन FICCI ने कहा है कि किसान आंदोलन के चलते नॉर्दर्न रीजन की इकोनॉमी को हर दिन 3000 करोड़ रुपए का नुकसान होने का अनुमान है।
मोदी की अपील- कृषि मंत्री की चिट्ठी जरूर पढ़ें
कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने गुरुवार को किसानों के नाम चिट्ठी लिखी, जिसमें न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) समेत दूसरी चिंताओं पर भरोसा दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों के साथ-साथ पूरे देश से तोमर की चिट्ठी पढ़ने की अपील करते हुए इसे सोशल मीडिया पर शेयर किया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- सरकार कानून होल्ड करने का रास्ता सोचे
किसानों को सड़कों से हटाने की अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को लगातार दूसरे दिन सुनवाई हुई। कोर्ट ने कहा कि किसानों को विरोध करने का हक है, लेकिन किसी की संपत्ति या किसी की जान को कोई खतरा नहीं होना चाहिए। साथ ही सलाह दी कि विरोध के तरीके में बदलाव करें, किसी शहर को जाम नहीं किया जा सकता। अदालत ने सरकार से भी पूछा- इस मामले की सुनवाई पूरी होने तक क्या आप कृषि कानूनों को रोक सकते हैं?
अभी नए कृषि कानून लागू करने के नियम ही नहीं बने, जैसे CAA के नहीं बने हैं
लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचारी ने कृषि कानूनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के कमेंट से जुड़े सवालों के जवाब बताए।

क्या किसी कानून पर अमल रोका जा सकता है?
बिल पर अमल का अधिकार कार्यपालिका का है। अमल के लिए नियम और दिशा-निर्देश होते हैं। कृषि कानूनों को लागू करने के नियम अभी बने ही नहीं हैं। यानी वे लागू ही नहीं हैं, तो फिर उन्हें रोक कैसे सकते हैं।

क्या पहले कभी ऐसा हुआ है कि बिल संसद में पारित हो गया और उस पर अमल नहीं हुआ?
इसका सबसे बड़ा उदाहरण नागरिकता कानून संशोधन एक्ट (CAA) है। यह पिछले साल संसद से पारित हुआ था। लेकिन, अभी तक इस कानून को लागू करने के नियम और दिशा-निर्देश नहीं बनाए गए हैं। इसलिए यह कानून अभी तक कोल्ड स्टोरेज में है।

अगर सरकार जल्दी ही नियम बना लेती है तो?
सुप्रीम कोर्ट चाहे तो केस चलने तक अमल के नियम नहीं बनाने का आदेश भी दे सकता है।

सुप्रीम कोर्ट का इरादा क्या लगता है?
सरकार और किसानों में बातचीत में प्रगति नहीं हो पा रही। कोर्ट संभावना तलाश रहा है कि क्या बातचीत जारी रहने तक कानूनों को बेअसर रखा जा सकता है। मुझे लगता है कि कोर्ट का यह कदम समाधान की दिशा में है।

क्या कोई सरकार कानूनों को निष्प्रभावी करने के लिए अध्यादेश भी ला सकती है?
नहीं। किसी भी कानून को निष्प्रभावी या रद्द करने के लिए संसद का सत्र एकमात्र विकल्प है। वैसे कानून पर अमल रोकने के लिए नियम नहीं बनाना ही ज्यादा कारगर तरीका है।

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