केंद्र का पंजाब को झटका:MP के बासमती को GI टैग देने की आपत्ति SC से वापस लेगा एपीडा, 40% चावल अमेरिका और कनाडा निर्यात का रास्ता साफ

भोपाल.कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के आंदोलन के बीच मोदी सरकार ने पंजाब को बड़ा झटका दिया है। केंद्र सरकार की एजेंसी कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) ने मध्य प्रदेश के बासमती चावल को जीआई टैग (जियोग्राफिकल इंडिकेशन) देने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में लगाई आपत्ति को वापस लेने का फैसला लिया है। इससे मप्र के बासमती चावल के निर्यात करने का रास्ता साफ हो गया है। मप्र का करीब 40% बासमती चावल जीआई टैग मिलते ही अमेरिका और कनाडा भेजा जा सकेगा। इससे मप्र के करीब 4 लाख किसानों को फायदा होगा। बता दें कि यूरोप में मप्र के बासमती चावल की डिमांड ज्यादा है, लेकिन जीआई टैग नहीं होने के कारण पंजाब इसे पूरी करता है।
मध्य प्रदेश बासमती चावल को जीआई टैग दिए जाने की लड़ाई 12 साल से लड़ रहा है। मप्र सरकार और मध्य क्षेत्र बासमती उत्पादक एसोसिएशन ने इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। इस पर एपीडा ने आपत्ति दर्ज कराई थी। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जुलाई 2020 को केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को पत्र लिखकर एपीडी की आपत्ति को वापस लेने का अनुरोध किया था। बताया जाता है कि एपीडा की 5 जनवरी को हुई बैठक में फैसला किया कि वह मध्य प्रदेश के बासमती चावल को जीआई टैग देने के मामले में अपनी आपत्ति वापस लेगा। एपीडा जल्दी ही आपत्ति वापस लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट में आवेदन करेगा। इसके बाद मप्र सरकार भी सुप्रीम कोर्ट से याचिका वापस लेगी।
किसानों को नुकसान
मप्र के 13 जिलों में श्योपुर, मुरैना, भिंड, ग्वालियर, दतिया, शिवपुरी, गुना, विदिशा, सीहोर, रायसेन, नरसिंहपुर, जबलपुर, होशंगाबाद जिले में 12 लाख टन यानी 1 करोड़ 20 लाख क्विंटल बासमती धान होती है। मिलिंग के बाद 7.50 लाख टन यानी 75 लाख क्विंटल चावल निकलता है। बासमती को जीआई टैग न मिलने से किसान इसे समर्थन मूल्य 1850 रुपए प्रति क्विंटल पर भी नहीं बेच पाते हैं। राज्य सरकार प्रदेश के बड़े इलाके में बासमती की खेती होने की वजह से भौगोलिक संकेत (जीआई टैग) दिए जाने की मांग करता रहा है।
2013 में भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्रार ने मप्र के पक्ष में दिया था निर्णय
मप्र को जीआई टैग देने के मामले में एपीडा 12 साल से आपत्ति करता आ रहा था। मप्र ने इस मामले में भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्रार (चेन्नई) के यहां अपील की थी। जिसने दिसंबर 2013 में भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्रार (चेन्नई) ने मप्र के पक्ष में निर्णय दिया था। लेकिन पंजाब ने बौद्धिक संपदा अपीलीय बोर्ड (आईपीएबी) चेन्नई में आपत्ति दर्ज करा दी थी। इस पर बोर्ड ने फरवरी 2016 में मप्र के खिलाफ आदेश दिया था। इसके बाद मप्र ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
ब्रिटिश गजेटियर पेश करने पड़े थे
मप्र ने 1908 व 1913 के ब्रिटिश गजेटियर पेश किए थे, जिसमें बताया था कि गंगा और यमुना के इलाकों के अलावा मध्यप्रदेश के भी कुछ जगहों में भी बासमती पैदा होती रही है। एपीडा ने इसके खिलाफ आईपीएबी में अपील की थी। तब एपीडा ने कहा था कि जम्मू एंड कश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली के अलावा कहीं भी बासमती चावल का उत्पादन नहीं होता।
PM मोदी को लिखा था पंजाब के CM ने पत्र
पंजाब राइस मिलर्स एसोसिएशन ने एग्रीकल्चर प्रोड्यूस एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी (एपीडा) को पत्र लिखकर मप्र में बासमती धान की खेती पर रोक लगाने की मांग की थी। जिसमें हवाला दिया गया है कि मप्र में बासमती की पैदावार लगातार बढ़ने से पंजाब के किसानों को नुकसान हो रहा है। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने भी इस संबंध में प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है। अगर मध्य प्रदेश को बासमती का जीआई टैग मिलता है तो लगभग 40 फीसदी बासमती अमेरिका और कनाडा जाएगा। इससे पंजाब को नुकसान है। क्योंकि वर्तमान में पंजाब इन देशों में बासमती भेज रहा है।
क्या है जीआई
जियोग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) में क्षेत्र विशेष में वस्तु अथवा उत्पाद के उत्पादन को कानूनी मान्यता गुणवत्ता व लक्षणों के आधार पर विशिष्ट पहचान मिलती है। बता दें कि पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश तथा जम्मू कश्मीर को बासमती का जीआई टैग मिल चुका है।

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