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असम से ग्राउंड रिपोर्ट:कांग्रेस-AIUDF गठबंधन से BJP की चिंता बढ़ी; यहां 3.5 करोड़ आबादी में 34% मुसलमान, 33 सीटों पर इनकी निर्णायक की भूमिका

असम में भाजपा ने अपने सहयोगी दलों के साथ मिलकर 126 विधानसभा सीटों में से 100 प्लस का टारगेट रखा है। लेकिन, कांग्रेस और मौलाना बदरुद्दीन अजमल की पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) के बीच हुए गठबंधन ने उसकी परेशानी बढ़ा दी है। उधर, नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध से जन्मी असम जातीय परिषद और रायजोर दल असमिया बहुल इलाकों में भाजपा के खिलाफ लोगों को एकजुट करने में जुट गई हैं।

इस बीच] शनिवार को बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट यानी BPF ने भी भाजपा गठबंधन से अलग होने का ऐलान कर दिया। इससे भाजपा की चिंता और बढ़ गई है। मौजूदा माहौल से लग रहा है कि असम में इस बार का मुकाबला चुनाव पार्टियों के गठबंधन के बीच होगा।

एक तरफ असम गण परिषद (AGP) और यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (UPPL) पार्टी को साथ लेकर BJP चुनाव में उतरेगी वहीं कांग्रेस ने 6 राजनीतिक दलों के साथ महागठबंधन बनाया है। इस महागठबंधन में AIUDF समेत CPI, CPM, CPM (ML) और CAA के खिलाफ बने क्षेत्रीय आंचलिक गण मोर्चा हैं। असम जातीय परिषद और रायजोर दल ने भी अपना मोर्चा बनाया है।

ऐसे में असम में इस बार मुकाबला दिलचस्प हो गया है। हालांकि असम बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रंजीत दास का मानना है कि उनकी पार्टी अपनी उपलब्धियों और सुशासन के बल पर सत्ता बरकरार रखेगी। वहीं असम की राजनीति को करीबी से समझने वाले जानकारों का कहना है कि कांग्रेस-एआईयूडीएफ गठबंधन का मध्य असम पर प्रभाव पड़ेगा। असम की कुल साढे तीन करोड़ आबादी में 34% मुसलमान हैं और 33 मुस्लिम बहुल विधानसभा सीटें है जहां इनकी भूमिका निर्णायक होती है।

कितना कारगर होगा कांग्रेस-AIUDF गठबंधन?
बंगाली मुसलमान परंपरागत रूप से पहले कांग्रेस को वोट दिया करते थे, लेकिन 2005 में AIUDF बनने के बाद इन वोटों में विभाजन हो गया। AIUDF के नेता भरोसा जताते है कि महागठबंधन BJP को शासन से हटाने में कामयाब होगा। हालांकि, अभी कांग्रेस और AIUDF में सीटों के बंटवारे को लेकर बात नहीं बन पाई है। AIUDF प्रमुख बदरुद्दीन अजमल ने हाल ही मे कहा था कि असम विधानसभा चुनाव में BJP को राज्य की सत्ता से बाहर करने के लिए वे कांग्रेस के साथ गठबंधन कर सीटों की कुर्बानी देने को तैयार हैं।

मौलाना अजमल कहते हैं कि कांग्रेस-AIUDF गठबंधन ने BJP को इतना परेशान कर दिया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को पिछले महीने में कई बार असम आना पड़ा। जबकि BJP के नेता खासकर कांग्रेस पर अजमल की पार्टी के साथ गठबंधन करने को लेकर निशाना साध रहें हैं।

असम बीजेपी के कद्दावर नेता हिमंत बिस्व सरमा ने धुबड़ी सीट से लगातार तीन बार सांसद बदरुद्दीन अजमल को असम का ‘दुश्मन’ कहा था। इसके साथ ही मौलाना अजमल पर कट्टरपंथी संगठनों से पैसा लेने और असम की संस्कृति के खिलाफ नेटवर्क खड़ा करने के आरोप लगाए जा रहें है। वहीं, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक रैली में इस गठबंधन पर सवाल खड़ा करते हुए पूछा कि अजमल के साथ जो बैठे हैं वो घुसपैठ रोक सकते हैं क्या?

भाजपा पर ध्रुवीकरण का आरोप
प्रदेश की राजनीति को समझने वालों का मानना है कि BJP नेता मौलाना अजमल पर ये हमले इसलिए कर रहें है ताकि राज्य की उन 36 विधानसभा सीटों पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण किया जा सके जहां CAA से नाराज असमिया भाषी लोग चुनावी फैसले का निर्धारण करते हैं। कांग्रेस नेता बबीता शर्मा इन हमलों के जवाब में कहती है कि हम (कांग्रेस और AIUDF) CAA का समर्थन नहीं करते हैं क्योंकि यह असम समझौते का खंडन करता है।

प्रदेश में चुनावी माहौल फिलहाल पूरी तरह गरमा गया है और सत्ताधारी BJP और कांग्रेस एक-दूसरे के खिलाफ पोस्टर लगाकर राजनीतिक हमले कर रही है। असम में कई जगहों पर भाजपा ने 100 प्लस सीटें जीतने के दावे के साथ पोस्टर लगाया है। जबकि कांग्रेस ने स्थानीय भाषा में ‘आइए असम को बचाते है’ जैसे पोस्टर लगाए हैं।

पेट्रोलडीजल की बढ़ती कीमतों का मुद्दा गायब है
इन सब के बीच पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की बढ़ती कीमतें और महंगाई पर अब तक ज्यादा चर्चा नहीं हुई है। जोरहाट जिले के मरियानी शहर में बसे और कपड़े का कारोबार कर रहे 58 साल के राम करण चौधरी गुस्सा जाहिर करते हुए कहते हैं कि पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें इतनी ज्यादा बढ़ गई हैं और महंगाई चरम पर पहुंच गई है। लेकिन, इन मुद्दों पर ज्यादा बात नहीं हो रही है। ऐसे हालात में गुजारा करना मुश्किल हो गया है।

कोरोना के कारण व्यापार पहले ही ठप पड़ चुका है। लोगों के हाथ में पैसा ही नहीं होगा तो व्यापार कैसे चलेगा? दूसरे राज्यों के मुकाबले भले ही प्रदेश में विधानसभा सीटों की संख्या ज्यादा नहीं है, लेकिन यहां विधानसभा के चुनाव उत्तर भारत के राज्यों की तरह जाति पर नहीं लड़ जाते। ऊपरी असम में CAA समेत 6 जनजातियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने जैसे कई प्रमुख मुद्दे हैं।

कांग्रेस ने भाजपा के शासन के खिलाफ असम बचाओ अभियान शुरू किया है। वहीं, इसके जवाब में BJP कांग्रेस-AIUDF की मित्रता को असम के लिए खतरा बता रही है। असम में अलग-अलग इलाको में बसी जनजातियां कुछ प्रमुख सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाती हैं। इस तरह राज्य में चाय जनजाति की आबादी करीब एक करोड़ है जिनकी 40 सीटों पर निर्णायक भूमिका रहती है। उसी तरह बंगाली बहुल बराकवैली में विधानसभा की 15 सीटें है। जबकि हिंदू असमिया बहुल ऊपरी असम में 36 सीटें है।

बाकी की सीटें सेंट्रल असम में आती है। असम में इस बार का मुकाबला सतारूढ BJP और कांग्रेस महागठबंधन के बीच माना जा रहा है। लेकिन, अभी सीटों के बंटवारे और महागठबंधन की औपचारिक घोषणा होना बाकी है।

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